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सोमवार, 12 नवंबर 2007

सब ढोल में पोल है

साक्षरता का प्रतिशत अपने देश में तेजी से बढ़ रहा है और आकड़े देखकर हम खुश हो रहे हैं कि हमारा देश नालेज इकोनामी बनने की राह पर तेजी से आगे बढ़ रहा है। लेकिन इस ढोल की आवाज पर न जाकर जरा इसके अंदर झांके-
मैं छोटा था, एक सुदूर गांव में रहता था। प्रौढ़ शिक्षा का अभियान चलाया जा रहा था उस समय। मेरे गांव में भी प्रौढ़ शिक्षा की किरण पहुंची एक लालटेन के साथ और उस लालटेन को रखने वाले प्रौढ़ शिक्षक को उसके लिए किरोसिन भी मिलता था। लेकिन वह लालटेन उस प्रौढ़ शिक्षक के घर पर ही जलती रही, सरकार किरोसिन देती रही और साथ में पढ़ाने के लिए कुछ किताबें और मानदेय भी। लेकिन मैने कभी अपने गांव में कोई कक्षा लगते नहीं देखी। रिकार्ड में सबकुछ ठीक था। इसी तरह पूरे देश में चला होगा और रिकार्ड बन गए होंगे। इस अभियान के बाद साक्षरता के आकड़े जबरदस्त रहे।
आजकल सर्वशिक्षा अभियान चल रहा है। इसमें भी ऐसा ही है। जिन लोगों को गुरूजी बनाया जा रहा है, उनसे नियुक्ति के लिए घूंस ली जा रही है। नेता खुश और अफसर मस्त, सर्वशिक्षा अभियान से और देश भी उत्साहित कि सब लोग पढ़े लिखे होते जा रहे हैं। यकीन मानिये अगले पांच-छह साल में जो आकड़े आएंगे, वे देश को सर्वाधिक शिक्षित आबादी वाले राष्ट्रों की कतार में खड़ा कर देंगे। हम आप देखते रहेंगे।

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