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गुरुवार, 20 दिसंबर 2007

बाबा त्रिलोचन पर भास्कर का दस्तक

पिछले हफ्ते दैनिक भास्कर उज्जैन ने बाबा त्रिलोचन पर पूरा पेज निकाला। किसी और अखबार ने बाबाको इस तरह से याद नहीं किया और इसकी खास बात यह है कि इसमें ब्लाग से लिए गए फोटो इस्तेमाल किए गए हैं और अखबार में ब्लागर इरफान को इसका क्रेडिट भी दिया है।

रविवार, 9 दिसंबर 2007

त्रिलोचन चलता रहा

जून, 1995. दिल्ली

मंडी हाउस पर नोएडा जाने वाली चार्टर्ड बस में त्रिलोचन

त्रिलोचन को देखा
पकी दाढ़ी
गहरी आंखें
चेहरे पर ताप
हाथ में झोला
चुपचाप खड़े थे बस के दरवाजे पर

ऐ ताऊ
पैसे दे

ऐ ताऊ
पीछे बढ़ जा, सीट है बैठ जा

जैसे प्रगतिशील कवियों की ऩई लिस्ट निकली थी
और उसमें त्रिलोचन का नाम नहीं था
उसी तरह इस कंडक्टर की बस में
उनकी सीट नहीं थी

सफर कटता रहा
त्रिलोचन चलता रहा
संघर्ष के तमाम निशान
अपनी बांहों में समेटे
बिना बैठे
त्रिलोचन चलता रहा

गांव का ह्वैगा बंटाढार

नौकर रहैं लूटि के भूंखे, पुलिस रहै प्रानन की भूंखी
मिलिकै सबकी भूंख अकट्ठै, खाइ गई कृषिकार।।

गांवन मां ना रहिगा पैसा, बिन पैसा सब मिटिगा रैसा
आंपुलि आपुलि परी प्रान की, अफसर बोलैं हेइसा हेइसा
स्वार्थ, दगा, छल, भूंख, बेकारी, चाि लिहिस कप्पार।।

खेती छीनि लगावैं जंगल, बांधैं बांध रोड रचि बंगल
एक्ट बांधि कै टैक्स अरोरैं, रोजुइ रचैं नुमाइश दंगल
दुइ दुइ आंगुर धरती पर ह्वै रहा देश संहार।।

छीनैं नोट रिश्वती अफसर, बचेखुचे व्यापारी तरकर
कार बार सब छीनि हुकूमति, रोज सुनावैं झूठे लेक्चर
तिमिछति फिरै गंवारू विचारा, कोइ न सुनै गोहार।।

बहिया, सूखा, आगा पानी, रोजु उड़ैलैं छप्पर छानी
घर बखरिन का डीहु डहेला, बांटैं राजि चबेना पानी
समय ओट के चलैं जीप पर, पार्टिन के मक्कार।।

न्याधीश न्याय ना जानैं, सत्य छोड़ि कानूनै मानैं
ऐय्यासिन मां फंसी हुकूमत, पत्र पुस्तकैं कीर्ति बखानैं
दुइ दुइ पैसन का मुंहि ताकैं, अन धन के दातार।।

यह कविता अवधी के कवि वंशीधर शुक्ल की है और शायद सन 50 के आसपास लिखी गई है लेकिन यह आज भी उतनी ही प्रासंगिक दिखाई देती है जितनी तब थी।

शनिवार, 8 दिसंबर 2007

इकोनोमिस्ट का कार्टून जबरदस्त है

इस कार्टून का लिंक
http://www.economist.com/daily/news/displaystory.cfm?story_id=10271442&fsrc=nwl

न पोस्ट करने का कारण


कुछ जरूरी व्यस्तताओं के कारण आजकल खुश अनकही नहीं कह पा रहा है। जैसे ही फारिग होगा अनकही कही जाने लगेगी। फिलहाल खुश कही को ही यहां दे पा रहा है।

गुरुवार, 6 दिसंबर 2007

अपरिचय के कांटे

मेरे मित्र ने यह कविता शायद 1987 में लिखी थी। मुझे बहुत अच्छी लगती है। आप लोगों के लिए यहां पेश है-
अपरिचय के कांटे
यदि चुभोने ही हैं
तो कैक्टस ही क्यों
गुलाब क्यों नहीं
आंखों में कुछ तो देसीपन रहने दो यार

बुधवार, 5 दिसंबर 2007

चोट्टा शायर

हिंदी के एक शायर हैं आलोक श्रीवास्तव। हाल में इनकी एक किताब आई आमीन। इसमें एक रचना की इन दो लाइनों पर गौर फरमाइए-
बाबूजी गुजरे, आपस में सब चीजें तकसीम हुईं,
तब-मैं घर में सबसे छोटा था, मेरे हिस्से में आई अम्मा।


अब देखें मशहूर शायर मुनव्वर राना की एक पुरानी और प्रसिद्ध गजल की लाइनें-
किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकां आई
मैं घर में सबसे छोटा था, मेरे हिस्से में मां आई


ये चोट्टई है कि नहीं। यहां तक भी ठीक था, कमलेश्वर जैसे प्रतिष्ठित साहित्यकारों को अपनी चोरहट्टू लाइनें दिखा कर इसने अपनी प्रशंसा में कुछ शब्द भी लिखवा लीं। फिर ये भाईसाहब उन शब्दों का इस्तेमाल करते हैं अपने कसीदे बनाने में। है न बेइमानी की इंतिहां।
ब्लाग की दुनिया के सब पंच लोग ही बताएं इस चोट्टे शायर को क्या कहा जाए?
चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ीPromote Your Blog
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