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सोमवार, 21 जनवरी 2008

इनफ्लेशन व रिसेशन, दोनों का डर

यह इलूस्ट्रेशन इकोनामिस्ट में छपा है।

HAVING a little bit of inflation is like being a little bit pregnant. Is that old adage worth bearing in mind as consumer prices across the globe accelerate?

गुरुवार, 20 दिसंबर 2007

बाबा त्रिलोचन पर भास्कर का दस्तक

पिछले हफ्ते दैनिक भास्कर उज्जैन ने बाबा त्रिलोचन पर पूरा पेज निकाला। किसी और अखबार ने बाबाको इस तरह से याद नहीं किया और इसकी खास बात यह है कि इसमें ब्लाग से लिए गए फोटो इस्तेमाल किए गए हैं और अखबार में ब्लागर इरफान को इसका क्रेडिट भी दिया है।

शनिवार, 8 दिसंबर 2007

इकोनोमिस्ट का कार्टून जबरदस्त है

इस कार्टून का लिंक
http://www.economist.com/daily/news/displaystory.cfm?story_id=10271442&fsrc=nwl

बुधवार, 5 दिसंबर 2007

चोट्टा शायर

हिंदी के एक शायर हैं आलोक श्रीवास्तव। हाल में इनकी एक किताब आई आमीन। इसमें एक रचना की इन दो लाइनों पर गौर फरमाइए-
बाबूजी गुजरे, आपस में सब चीजें तकसीम हुईं,
तब-मैं घर में सबसे छोटा था, मेरे हिस्से में आई अम्मा।


अब देखें मशहूर शायर मुनव्वर राना की एक पुरानी और प्रसिद्ध गजल की लाइनें-
किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकां आई
मैं घर में सबसे छोटा था, मेरे हिस्से में मां आई


ये चोट्टई है कि नहीं। यहां तक भी ठीक था, कमलेश्वर जैसे प्रतिष्ठित साहित्यकारों को अपनी चोरहट्टू लाइनें दिखा कर इसने अपनी प्रशंसा में कुछ शब्द भी लिखवा लीं। फिर ये भाईसाहब उन शब्दों का इस्तेमाल करते हैं अपने कसीदे बनाने में। है न बेइमानी की इंतिहां।
ब्लाग की दुनिया के सब पंच लोग ही बताएं इस चोट्टे शायर को क्या कहा जाए?

शनिवार, 1 दिसंबर 2007

न तो दुनिया से लेफ्ट उठ रहा है और न इंसानियत की विचारधारा

विवेक सत्य मित्रम के पोस्ट क्या गैर वामपंथी होना गुनाह है पर-

1.गैर वामपंथी होना या न होना गुनाह या पुण्य से जुड़ा नहीं है लेकिन इंसानियत की विचारधारा की बात करने वाले को यह सवाल शोभा नहीं देता। लगता है मित्रम जी करात, बुद्धदेव, वर्धन, नीलोत्पल बसु, आईसा, एसएफआई आदि से ही लेफ्ट की विचारधारा को समझते हैं। न तो दुनिया से लेफ्ट उठ रहा है और न इंसानियत की विचारधारा। वैसे दोनों एक-दूसरे के पर्याय ही हैं। इंसानियत की अगर कोई विचारधारा है तो वह बुद्ध-गुरू गोविंद सिंह-मार्क्स-लेनिन-माओ के रास्ते ही निकली है। नेपोलियन-जार-हिटलर-मुसोलिनी-गुरू गोलवलकर-बुश-लादेन-तोगड़िया-आडवाणी के रास्ते नहीं। सिर्फ लेफ्ट ही इंसान की बराबरी और उसके जीने की हक की बात करता है। बाकी तो अमीर बने रहने के लिए गरीबी बनाए रखने (इंसान के शोषण) की अनिवार्यता ही जताते हैं।

2. दुखद यह है कि अधकचरी समझ के चलते छल्लों-दुमछल्लों को लेफ्ट मानकर इस महान विचारधारा का आकलन किया जा रहा है।

3. आप कहते हैं कि आप कनफ्यूज्ड नहीं हैं लेकिन हैं आप भयंकर रूप से कनफ्यूज्ड। भारत के लेफ्ट ग्रुप्स के बारे में भी आपकी जानकारी अधकचरी है। किसी की सही आलोचना आप तब तक नहीं कर सकते जब तक आप उसे पूरी तरह से जान न लें। प्रकाश करात और दीपांकर भट्टाचार्य के अंतर को समझना ही पड़ेगा।

4. माफ करिएगा आपका यह ब्लाग बोगस वाम विरोधियों का अड्डा बनता नजर आ रहा है।

बुधवार, 21 नवंबर 2007

त्रिलोचन की कविता : अपना गला फंसाकर मैं भर पाया

संशय कर। संशय कर। संशय कर। संशय से
तू जीवन का प्रखर सत्य पाएगा। पट्टी
आंखो पर विश्वास की न ले। जग में टट्टी
ओट शिकार खेलने वाले मत्त विजय से
बिचर रहे हैं, मृग अर्धावलीढ कुश भय से
गिरा गिरा कर भाग रहे हैं। तबियत खट्टी
आज अहिंसा की है और शांति की सट्टी
मंद पड़ रही है लक्ष्य वेध कर, भढ़ चल नय से।

कल जो कहता था ईमान नहीं बेचूंगा,
वह चुपके ईमान बेचकर घर आया है,
क्या करता; परिजन हैं, संतति है, जाया है!
मन को समझा दिया, और कब तक खेंचूंगा
इनको अपने पीछे, अधिक नहीं मैं दूंगा।
अपना गला फंसा कर मैने भर पाया है।

-त्रिलोचन

रविवार, 18 नवंबर 2007

आम आदमी को गरिया कर आएगा इनका समाजवाद-जनवाद-2

लगता है कि लिबरेशन के जो लोग जनमत ब्लाग पर लिख रहे हैं, उनका पक्का विश्वास है कि आम आदमी को गरिया कर ही समाजवाद-जनवाद लाया जा सकेगा। विनोद मिश्रा की लीगैसी वाले ये लोग इतना डरे हुए क्यों हैं? नंदीग्राम को लेकर किन्ही सत्यम ने एक पोस्ट लिखी और लिबरेशन के लोग दाना-पानी लेकर उसके पीछे भी पड़ गए। ऐसी बात कर रहे हैं ये लोग जैसे कोई भी ब्लाग लिखे तो कीबोर्ड इन्हीं से मांगे, नहीं उसे कुंठित करार दे दिया जाएगा।
मेरी जो मोटी समझ है, उसके मुताबिक यदि आप सामाजिक क्रांति और एक नए समाज के निर्माण के लिए काम कर रहे हैं तो आपको आम आदमी की चिंताओं, भ्रांतियों को सहिष्णुता से साफ करना चाहिए और उसकी सोच, सपनों व आकांक्षाओं को भी समझना चाहिए। हो उल्टा रहा है। कोई यदि अपनी बात रख दे, तो ये उसे भ्रष्ट, कुंठित और न जाने क्या क्या करार दे देते हैं जिससे के वह इनसे डरे और न अपनी बात रखे और न ही इनके यहां की गड़बड़ियों पर उंगली उठाने की हिम्मत करे।
ये लोग मार्क्स से ही कुछ सीखें कि उनने उस समय के समाज को समझा, उनकी दिक्कतें समझीं, उनकी आकांक्षाएं समझीं और फिर उनके हिसाब से नए समाज का खाका दिया। साथ में मजबूत दार्शनिक व आर्थिक आधार। लेकिन ये लोग ऐसा कुछ करने की जहमत नहीं उठाना चाहते। मार्क्स की आइडियोलाजी लेकर चलना कतई गलत नहीं है लेकिन लकीर के फकीर बनकर दुर्भाग्यपूर्ण है। उनका चश्मा आज नहीं चल सकता। अब नंबर बदल गया है। दूसरा चश्मा बनाना ही पड़ेगा। ये लोग चश्मा बदलना नहीं चाहते और ऊपर से गाली-गलौज कर सबको धमकाने पर आमादा नजर आते हैं जनवादी शब्दभंडार से। मोहल्ला पर सत्यम के पोस्ट पर इन्होंने यही करने की कोशिश की है।
लेकिन हम हिंदुस्तान में रहते हैं, पाकिस्तान या चीन में नहीं जहां कुत्तों को भी भौकने के लिए जनरल या सेक्रेटरी जनरल से परमीशन लेनी पड़ती है (हमें कम से कम ये जनवादी आदमी तो मानते ही होंगे, ऐसा मैं सोचता हूं लेकिन हो सकता है कि ये हमें आदमी से कमतर और अपने को आदमी से भी बेहतर मानते हों)। और ब्लाग जितना इनका है उतना ही हमारा यानी आम आदमी का।

आप खुद समझ जाएंगे, जनमत पर सत्यम की पोस्ट को लेकर पड़ी प्रतिक्रिया ये अंश देखिए-



...यही वह संगठन है जहां आप सत्तर-तीस के अनुपात में लड़के-लड़कियों की भागीदारी पाते हैं। लेकिन बाकी तमाम छात्र संगठनों में यह अनुपात कितना है यह पता लगाना आप जैसे लोगों के बस में नहीं है। क्योंकि तब आप क्या तर्क देंगे अपनी इस बेतुके कथन के समर्थन में आप को भी पता नहीं शायद।...
...आप के संपर्क के युवा साथी निसंदेह ऐसे ही होगें क्योंकि व्यक्ति अपने तरह के सोच वाले लोगों से ही संबध बना पाता है। ...
...अक्सर इस तरह के लेखक गैर-राजनितिक प्रवृत्ति का समर्थन करते हैं, और दावा करते हैं कि वे किसी भी राजनैतिक संगठन से नहीं जुड़े हैं। यह समझ ही एक खास तरह की राजनीति की तरफ इशारा करती है। इस समझ के लोग कोई भी राजनैतिक संगठन में लड़कियों से इन्टरैक्शन या इसी तरह के किसी बहुत ही उथळे कारण से शामिल होते हैं और किसी तरह की खुराक की खोज में रहते हैं क्योंकि बुद्धि और समझ से उनका कोई वास्ता नहीं होता।
...जिनके लिए लेफ्ट केवल दिमागी खुराक का साधन है उनके दिमाग इस खुराक का उनकी राजनैतिक समझ में प्रयोग न होने के कारण मोटे हो जाते हैं और फिर उन्हे लेफ्ट के नाम पर केवल सीपीआई और सीपीएम ही दिखने लगते है। उनका यही मोटा दीमाग लेफ्ट के तमाम धाराओं और रणनीति के बीच अन्तर करने से सचेत रुप से इन्कार कर देता।...

शनिवार, 17 नवंबर 2007

आम आदमी को गरिया कर आएगा इनका समाजवाद-जनवाद

सूडो सेकुलर के बाद अब दुमछल्ला वामपंथ शीर्षक वाली मेरी पोस्ट पर झल्ला कर जनमत ब्लाग पर गालियों की बौछार ही कर दी गई। बहुत सारे सवाल दाग दिए और मुझ पर आरोपों की ऐसी बौछार कर दी गई जैसे मेरी इस पोस्ट से इनका जनवाद गायब हो जाएगा।

नहीं भाईसाहब, आप ही तय करेंगे दुमछल्ला कौन है और छल्ला कौन है? मैं न तो किसी राजनीतिक पार्टी का मेंबर हूं न कोई एक्टिविस्ट।न मैं आप लोगों जैसा छल्ला वामपंथी हूं और न सीपीआई-सीपीएम जैसा दुमछल्ला। (आप लोग एसएफआई को अपना दुश्मन ही मानते हो)। मैं तो आम आदमी हूं जिसके लिए आप लोग समाजवाद लाने का बीड़ा उठाए हुए हैं। आम आदमी को गाली देकर समाजवाद कैसे आएगा। क्या उस समाजवाद में मेरे जैसे आम आदमी की कोई जगह होगी, जो शेयर बाजार में कुछ पैसा लगातानहीं है लेकिन सोचता जरूर है कि एक दिन इतना पैसा हो जाए कि शेयर बाजार में लगा सके। माता-पिता, बेटा-बेटी और अपने बुढ़ापे की जरूरतें पूरी करने के लिए कुछ बचत कर लेता है और पीपीएफ आदि में जमा करता है। क्या यह सब करना आपके सपनों के समाज में गुनाह होगा और जो यह करेगा,क्या उसको देश बदर कर देंगे।
आपने जो जवाब दिया है, उससे तो यही लगता है कि आप आम आदमी को ढोर-डंगर ही समझते हैं।
आपने लिखा कि मैं भ्रष्ट जनवाद का नुमाइंदा हूं, ठीक कहा आपने आम आदमी को सभी राजनीतिक दल ऐसे ही देखते हैं भले ही फिर वो लिबरेशन के टैग वाले क्यों न हों।आपने मुझे अवसरवादी बाजार प्रेमी दुमछल्ला करार दे दिया। अवसर का फायदा उठाने में क्या गड़बड़ है। आपके लोग अवसरों का फायदा नहीं उठाते क्या, आपके लोग शेयर बाजार में पैसा नहीं लगाते क्या, आपके लोग दलालस्ट्रीट का बखान करने की नौकरी नहीं करते क्या। जां तक मैंने पता लगाया है कि जेएनयू के चुनाव विश्लेषण करने वाले सज्जन दलाल स्ट्रीट की आवाज बने हुए हैं। अब आप यह तो बताइए कि जनवादी दलाल स्ट्रीट किस पाले में है।
खैर जो भी हो, आप लोग सियासी लोग हैं, हमें जो चाहिए वह कहिए। हम तो मूली-घास हैं, कुछ सवाल उठा दें तो गालियों से नवाज दीजिए। लेकिन आपके लोग कुछ करते रहें पवित्र जनवाद के नाम पर, सब जायज है।

जनमत पर यह लिखा गया है-

जनवाद का 'दलाल स्ट्रीट'

जनमत पर जेएनयू के चुनावों का दिलीप मंडल ने एक विश्लेषण रखा। जिस पर जाहिर है कई प्रतिक्रियाएं होनी थी। लेकिन पहली प्रतिक्रिया आई किसी ‘खुश’का। एसएफआई की हार से तिलमिलाए ये सज्जन जा पहुंचे त्रिलोचन शास्त्री के लिए जारी जनमत की अपील तक। फिर उन्हे याद आया कि किन्ही अनिल रघुराज( ये किन्ही अनिल रघुराज उनके ब्लॉग के 'दोस्त लोग'में हैं..फिर ये किन्ही कैसे हुए!!?) ने भी लिबरेशन और कम्यूनिज्म के विरोध में कुछ लिखा है और उसके बाद ये अपनी समझ से इस राजनीति पर कई वार करते गए। उन्हे सबसे ज्यादा आपत्ति थी दुमछल्ले वामपंथ पर। चंद्रशेखर की मां को लेकर लिखे गए टिप्पणी से उलझते हुए वे सिर टकराने लगे। लेकिन जब इनके लेखन या ब्लॉग लीला का दौरा हुआ तो सामने आया कि ऐसे भ्रष्ट जनवाद के नुमाइंदे बाजार की समझ से त्रिलोचन और सही वामपंथ को तौलते हैं। टुकडे –टुकड़े में जन आंदोलनों की कमजोरियों और सचेत ढंग से प्रचारित अफवाहों के ये सौदागर मौका तलाशते हैं कि कैसे आम लोगों को सही मुद्दों और बातचीत से भटकाया जाय.. देखिए इस दुमछल्ले वामपंथी का लेखन...जैसा कि ये खुद दावा करते हैं ये कहीं नौकरी नहीं करते लिहाजा बाजार इनकी मजबूरी नहीं बल्कि पसंद है। ये पूरी तरह बाजार की बीमारी जानते हैं लेकिन त्रिलोचन की बीमारी जानने का इन्हे कोई रास्ता नजर नहीं आता। इस बाजार प्रेमी दुमछल्ला वाम की यही कहानी है यह अवसरवाद का सबसे घृणित प्रतिनिधि है। जब यह बाजार की बात कह रहा है तो नहीं लगता कि साथ में दुमछल्ले वाम का घोषणा पत्र लिख रहा है..



ये लिखते हैं...
"शेयर बाजार में करेक्शन का दौर है, बहाना चाहे जो हो। यह करेक्शन लंबे समय से अपेक्षित था। अलबत्ता, दिवाली पर पीटने के लिए लिवाली का अच्छा मौका बन रहा है। लेकिन बाजार में लघुअवधि में फायदा वही उठा पाते हैं जो हवा का रुख भांपने में सक्षम होते हैं। पूरा खेल यह है कि क्या आप इस बात का सटीक अनुमान लगा पाते हैं कि बाजार में बहुमत की धारणा क्या है। अगर हां, तो आप राजा हैं। दूसरा फैक्टर है डर और लालच। बाजार से फायदा उठाना है तो इऩ पर विजय पानी होगी।खैर, शेयर बाजार में इस समय आशंकाओं का राज है। यह कितना गहरा है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाइए कि रिलायंस इंडस्ट्रीज व विप्रो के नतीजे भी इऩ पर काबू न कर सके।

नोट- निवेश करने से पहले खुद पोढ़े हो लें। अपन की जिम्मेदारी नहीं है।"

मेरी बाई लिस्ट
1यूको बैंक (39 से नीचे खरीदें)
2 एचएफसीएल (22-23 पर लें)
3 टेलीडाटा (55 से नीचे)
4 कोठारी शुगर (12 पर लें)
5 बलरामपुर चीनी (50 पर आने का इंतजार कर लें)
6. केसीपी शुगर (18 के नीचे खरीदें)

अब आप ही तय करिए कि क्या ऐसे लालची व्यक्तित्व वाले ही तय करेंगे कि सही जनवाद और उसकी राजनीति क्या है और त्रिलोचन का कद कितना है...
मतलब यह हुआ कि शेयर बाजार में यदि किसी की रुचि हो तो वह लालची है। वह अवसरवाद का घृणित प्रतिनिधि है। मेरे जैसा आम आदमी जनवाद समझ ही नहीं सकता और न त्रिलोचन को समझ सकता है और न उनका कद सोच सकता है। उसको चंपा काले अच्छर नहीं चीन्हती कविता समझ में ही नहीं आ सकती। और न वह त्रिलोचन के अपमान को समझ सकता है। हम आप लोगों के लिए झुनझुने हैं। बजेगा तो काम का नहीं तो भाड़ में जाए और बोनस में दो-चार लात-घूंसे (गालियां) और। हां हम कैसे समझ सकते हैं, हम त्रिलोचन को शर्तों के साथ नहीं मानते हैं। हम उनको अछूत नहीं घोषित करते हैं।

रही बात त्रिलोचन की हारी-बीमारी जानने की तो त्रिलोचन तो जनता के कवि हैं लिबरेशन के नहीं और हम जैसी जनता उनका हालचाल जान ही लेगी, जनवादी लोगों को चिंता करने की जरूरत नहीं है। यदि हमारे जैसा आम आदमी बाबा के लिए कुछ करना चाह रहा होगा तो उसका ढिंढोरा नहीं पीटेगा। आपसे पूछने की भी जरूरत नहीं है।



लेकिन मुझे दुख इस बात का है कि मैने त्रिलोचन के लिए जनमत की दया की अपील और जेएनयू चुनाव पर विश्लेषण को लेकर जो सवाल उठाए और जिनसे ये लोग तिलमिलाए, उनका तो मुझे इनकी पोस्ट में जवाब ही नहीं मिला। मिलता भी क्यों जनवादी लोगों को शायद जनता के सवालों का जवाब देने की जरूरत ही नहीं। देश की राजनीति की यही विडंबना है, चाहें कांग्रेस हो या भाजपा, माकपा-भाकपा हो या लिबरेशन, जनता के प्रति जवाबदेही गायब है। इनके अपने चश्मे जिनसे ये दुनिया देखते हैं और

अपनी प्रजा यानी आम जनता
के मुद्दे हल करते हैं।


अंत में 3 सवाल और
1.मैं ब्लाग लिखूं तो ये लिबरेशन के जनवादी इसे लीला कहते हैं लेकिन इनका ब्लाग लिखना लीला नहीं है पवित्र जनवाद है?
2.ये लोग इतना क्यों डर गए कि मेरे ब्लाग के सारे लिंक भी तुरंत खंगाल डाले?
3.इन्होंने कहा कि मैंने अपनी समझ का इस्तेमाल टिप्पणी लिखने में किया है। भाई मैं तो अपनी समझ से काम लेता हूं, हो सकता है लोग उधार की समझ से काम चलाते हों (अब इसे उधार की कहें या लकीर की फकीरी कहें, लेकिन इनकी समझ है कहीं और से ही संचालित)? अपनी समझ का इस्तेमाल करना क्या भ्रष्ट और घृणित होने की निशानी है?

शुक्रवार, 16 नवंबर 2007

सूडो सेकुलर के बाद अब दुमछल्ला वामपंथ

सीपीआई (एमएल) लिबरेशन के ब्लाग समकालीन जनमत पर टीवी पत्रकार दिलीप मंडल की टिप्पणी जेएनयू में दुमछल्ला वामपंथ की हार पर -
आप लोग खुश हो लीजिए और भाजपा की तरह आप भी नई परिभाषाएं गढ़िये। बधाई। जब भाजपा देश में पहली बार मजबूत हुई तो उसने सूडो सेकुलर (छदम धर्म निरपेक्ष) गढ़ा और आप इस बार जेएनयू में जीत गए तो दुमछल्ला वामपंथ निकाल दिया। दरअसल, हमारे यहां के कम्युनिस्टों और भाजपाइयों के तौर-तरीके एक जैसे ही हैं। इस देश को कम्युनिस्टों से बहुत उम्मीद थी लेकिन दुमछल्ले हों या छल्ले सबने धोखेबाजी की। नहीं तो 1952 में संसद में प्रमुख विपक्षी दल की हैसियत रखने वाले कम्युनिस्टों की आज यह हालत नहीं होती। एक-दूसरे को गरियाते रहिए। आप लोगों को एबीवीपी की हार अपनी उपलब्धि नहीं लगती बल्कि सीपीएम व सीपीआई की हार उपलब्धि लगती है।
आप तो अपने को सही कम्युनिस्ट कहते हैं, लेकिन भाईसाहब कभी अपने गिरेबान में भी झांका कीजिए। ऐसे ही लाल-पीले-हरे-नीले मत होइए। आप सब हैं एक ही थैली के चट्टे-बट्टे।
मैने तो किन्ही अनिल रघुराज के ब्लाग एक हिंदुस्तानी की डायरी पर मानस की कथा पढ़ी और मुझे अपने गांव की कहावत जिसकी पूंछ उठाओ वही मादा याद आ गई। (इस कहावत को आप लोग जेंडर इश्यू मत बनाइएगा, मैं इस कहावत को सिर्फ इसलिए कोट कर रहा हूं जिससे संप्रेषण सटीक रहे। वैसे आप लोगों का क्या भरोसा इस कहावत के ही छल्ले बनाकर उड़ाने लगें)

किसे कहेंगे हिंदी की हत्या

उदय प्रकाश जी के ब्लाग पर प्रकाशित हिंदी के हत्यारे-2 नामक
प्रभु जोशी के लेख के शुरुआती पैरे मैं यहां कोट कर रहा हूं-

प्रॉसेस ऑफ कॉण्ट्रा-ग्रेज्युअलिज़म´ - यानी बाहर किसी को पता ही नहीं चले कि भाषा को `सायास´ बदला जा रहा है । बल्कि, `बोलने वालों´ को लगे कि यह तो एक ऐतिहासिक प्रक्रिया है। कुछ अखबारों की भाषा में, यह परिवर्तन उसी प्रक्रिया के तहत हो रहा है । इसका एक तरीका है कि अपने अखबार की भाषा में आप हिन्दी के मूल दैनंदिनी शब्दों को हटाकर, उनकी जगह अंग्रेजी के उन शब्दों को छापना शुरू कर दो, जो बोलचाल की भाषा में `शेयर्ड - वकैब्युलरि´ की श्रेणी में आते हैं । जैसे कि रेल, पोस्टकार्ड, मोटर, स्टेशन, पेट्रोल पंप आदि-आदि ।
फिर धीरे-धीरे इस शेयर्ड वकैब्युलरि में रोज-रोज अंग्रेजी के नये शब्दों को शामिल करते जाइये । जैसे पिता-पिता की जगह छापिये पेरेंट्स, छात्र-छात्राओं की जगह स्टूडेंट्स, विश्वविद्यालय की जगह युनिवर्सिटी, रविवार की जगह संडे, यातायात की जगह ट्रेफिक आदि-आदि । अंतत: उनकी तादाद इतनी बढ़ा दो कि मूल भाषा के केवल कारक भर रह जायें ।
यह चरण, `प्रोसेस ऑव डिलोकेशन´ कहा जाता है । यानी की हिन्दी के शब्दों को धीरे-धीरे बोलचाल के जीवन से उखाड़ते जाने का काम ।.... (पूरा लेख उदय प्रकाश जी के ब्लाग पर पढ़ा जा सकता है)



लेख वाकई विचारोत्तेजक है। हमें सोचने पर मजबूर कर रहा है कि हिंदी पिछड़ी क्यों? स्वनामधन्य हिंदी प्रेमी हर उस तर्क को यह कहकर खारिज करते रहते हैं कि अमेरिकी या साम्राज्यवादी साजिश का हिस्सा है। भाषा शास्त्रीय संगीत नहीं होती वह है लोकसंगीत और इसीलिए उसमें बदलाव आते रहते हैं, व्यापकता बढ़ती रहती है और संप्रेषणनीयता समृद्ध होती रहती है। यदि भाषा नदी की तरह नहीं हो सकती तो वह दूर तक नहीं जा सकती, उसका सूखना तय है। सरकारी फीड से उसे सूखने से बचाया नहीं जा सकता।
मेरे साथ बहुत पहले एक वाक्या हुआ था, वह आज प्रभु जोशी का लेख पढ़कर याद आ गया-
1985 की बात है और मैं लखनऊ विश्वविद्यालय में पढ़ रहा था। एक दिन रात को हम संगम चौराहे पर विश्वविद्यालय आने के लिए रिक्शा तलाश रहे थे। एक रिक्शेवाला तैयार हुआ तो हमने कहा विश्वविद्यालय चलना है। रिक्शेवाले ने पूछा- यू कहां है। तो हमने कहा तुम लखनऊमा रिक्शा चलावत हौ और यहउ नाइ जानत हौ कि विश्वविद्यालय कहां है। खैर हमने उसे बताया कि रैदास के आगे पुलिस लाइन के सामने। तो वह बोला- यूनीवस्सिटी ब्वालव ना।

मंगलवार, 13 नवंबर 2007

इस गीत की भी फर्जी रजिस्ट्री हो चुकी है

कदम-कदम बढ़ाए जा
खुशी के गीत गाए जा
ये जिंदगी है कौम की
तू कौम पे लुटाए जा

इस गीत को भी भाई लोगों ने कब्जिया लिया है। मुझे पूरा यकीन है कि जरूर किसी के नाम कर दिया गया होगा यह गीत। खुश ने अपने कई कम्युनिस्ट व समाजवादी मित्रों से पूछा-भाई, इसके रचयिता का नाम आप लोग क्यों नहीं देते हो। लेकिन कोई कनविंसिंग जवाब नहीं मिला। मुझे इस बात की जानकारी नहीं है कि इसकी फर्जी रजिस्ट्री किसके नाम है लेकिन इसकी फर्जी रजिस्ट्री हो चुकी है। यदि आप लोगो को पता हो तो बताएं।

यह कविता शैलेंद्र की???

अहा जिंदगी में गीतकार शैलेंद्र पर अरविंद कुमार के दो लेख छपे हैं। नवंबर अंक में छपे भाग दो के साथ एक प्रसिद्ध कविता भी छापी गई है और बताया गया है कि यह शैलेंद्र की है। लेकिन यह कविता शैलेंद्र की नहीं है। हो सकता है कि शैलेंद्र ने इस कविता में कुछ जोड़ा हो। कविता इस प्रकार है-

तू जिंदा है तो जिंदगी की जीत में यकीन कर
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला जमीन पर
ये गम के और चार दिन, सितम के और चार दिन
ये दिन भी जाएंगे गुजर, गुजर गए हजार दिन....
यह कविता बहुत लंबी है और क्रांति गीत के तौर पर नौजवानों द्वारा गाई जाती रही है। बहुत संभव है कि शैलेंद्र ने इस कविता को उठा कर पूरे देश में पहुंचा दिया हो लेकिन यह कविता मूल रूप से अवधी के कवि वंशीधर शुक्ल ने लिखी है। उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले के रहने वाले शुक्ल जी ने यह कविता 1947 से पहले लिखी थी और वे इस कविता को सुनाकर नौजवानों में जोश भरा करते थे। लखनऊ विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में 70-80 के दशक में उनकी रचनाओं पर बहुत काम हुआ है। बाद में उनकी रचनाओं की एक समग्र पुस्तक भी प्रकाशित हुई। शुक्ल जी मूल रूप से कांग्रेसी थे लेकिन आजादी के बाद वह नेहरू के घोर विरोधी हो गए और आचार्य नरेंद्र देव के साथ चले गए थे। उनका यह विरोध न सिर्फ उनकी कविताओं में बल्कि उनके राजनीतिक जीवन में चिल्ला-चिल्लाकर बोला।
इस कविता को कम्युनिस्टों, समाजवादियों ने खूब इस्तेमाल किया। क्रांति गीतों की पुस्तकों में इसे हर जगह शामिल किया गया लेकिन किसी ने यह जहमत उठाने की कोशिश नहीं कि पता करे कविता लिखी किसने है। हो सकता है कि कम्युनिस्ट भाइयों ने जानबूझकर कवि का नाम छिपाया हो क्योंकि कवि कांग्रेसी था और उत्तर प्रदेश असेंबली का सदस्य भी रहा था।

शुक्रवार, 9 नवंबर 2007

चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी
अखाड़े का उदास मुगदर पर एक पोस्ट पर प्रदर्शित टिप्पणियों के जवाब में
मिहिरभोज और अनुनाद सिंह जी,
सही और तार्किक बातों को फासिस्ट ताकतें हमेशा इमोशन से ढंकती आई हैं। सीधे-सादे लोग उन इमोशंस में बहकर इन ताकतों के पीछे खड़े हो जाते हैं, बिना यह समझे कि वे कितना बड़ा अपराध कर रहे हैं। इन सीधे-सादे लोगों की गलती नहीं होती क्योंकि वे सरल रेखा में ही चीजों को देखते हैं। और इसी ट्रिक से कभी हिटलर, कभी मुसोलनी, कभी जियाउलहक, कभी मुशरर्फ और कभी मोदी खड़े होते हैं एक बड़े स,े खोल के साथ। यह खोल फूला होता है इन्हीं सीधे-सादे लोगों के सपोर्ट की हवा से। इसमें ठोस कुछ नहीं होता और यही वजह है कि जब इस खोल की हवा निकलती है तो कुछ बचता नहीं है। आप लोग तो पढ़े-लिखे लगते हैं, इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं यानी देश के उन चुनिंदा लोगों में से हैं जिनपर देश को नए जमाने में प्रगति की राह पर ले जाने की जिम्मेदारी आयद है। लेकिन उम्मीद कम ही नजर आती है। खैर, सबको हक है अपनी-अपनी बात रखने का और अपना-अपना पाला तय करने का लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इतिहास ने भी हिटलर के समर्थकों को भी फासिस्ट ही कहा, इनमें बहुत से लोग आप जैसे भले और सीधे-सादे भी रहे होंगे।
चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ीPromote Your Blog
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