हिंदी के एक शायर हैं आलोक श्रीवास्तव। हाल में इनकी एक किताब आई आमीन। इसमें एक रचना की इन दो लाइनों पर गौर फरमाइए-
बाबूजी गुजरे, आपस में सब चीजें तकसीम हुईं,
तब-मैं घर में सबसे छोटा था, मेरे हिस्से में आई अम्मा।
अब देखें मशहूर शायर मुनव्वर राना की एक पुरानी और प्रसिद्ध गजल की लाइनें-
किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकां आई
मैं घर में सबसे छोटा था, मेरे हिस्से में मां आई
ये चोट्टई है कि नहीं। यहां तक भी ठीक था, कमलेश्वर जैसे प्रतिष्ठित साहित्यकारों को अपनी चोरहट्टू लाइनें दिखा कर इसने अपनी प्रशंसा में कुछ शब्द भी लिखवा लीं। फिर ये भाईसाहब उन शब्दों का इस्तेमाल करते हैं अपने कसीदे बनाने में। है न बेइमानी की इंतिहां।
ब्लाग की दुनिया के सब पंच लोग ही बताएं इस चोट्टे शायर को क्या कहा जाए?
बुधवार, 5 दिसंबर 2007
लिद्दर और गोपाल सिंह नेपाली की कविता
जब मैने पहली बार लिद्दर नदी देखी, उसकी कलकल सुनी तो मुझे यह कविता याद आ गई। बचपन में मैं सोचा करता था, क्या कोई नदी ऐसी भी होती होगी? कश्मीर के अनंतनाग जिले में लिद्दर के किनारे चलते हुए मुझे जबाव मिला-हां। पहली बार 2000 में तो मैंने कई जगह रुक-रुक कर लिद्दर को छुआ, उसकी कलकल निनाद सुनी और उसकी शीतलता महसूस की। 
उसके बाद से जब भी मैं वहां गया एक-दो घंटे लिद्दर के किनारे गुजारे ही। पहलगाम में लिद्दर के किनारे एक छोटी सी काटेज है, जिसके तीन तरफ से मन का विह्वल जल है जो मन को विह्वल करता है। यह काटेज रुकने की मेरी सबसे पसंदीदा जगह है। फिलहाल आप भी इस कविता का आनंद लें। जिन लोगों ने लिद्दर को देखा हो, वे लिद्दर को महसूस करें और जिन्होंने नहीं देखा वे इस कविता को पढ़कर लिद्दर की कल्पना कर सकते हैं-
यह लघु सरिता का बहता जल
कितना शीतल¸ कितना निर्मल¸
हिमगिरि के हिम से निकल–निकल¸
यह विमल दूध–सा हिम का जल¸
कर–कर निनाद कल–कल¸ छल–छल
बहता आता नीचे पल पल
तन का चंचल मन का विह्वल।
यह लघु सरिता का बहता जल।।
निर्मल जल की यह तेज़ धार
करके कितनी श्रृंखला पार
बहती रहती है लगातार
गिरती उठती है बार बार
रखता है तन में उतना बल
यह लघु सरिता का बहता जल।।
एकांत प्रांत निर्जन निर्जन
यह वसुधा के हिमगिरि का वन
रहता मंजुल मुखरित क्षण क्षण
लगता जैसे नंदन कानन
करता है जंगल में मंगल
यह लघु सरित का बहता जल।।
ऊँचे शिखरों से उतर–उतर¸
गिर–गिर गिरि की चट्टानों पर¸
कंकड़–कंकड़ पैदल चलकर¸
दिन–भर¸ रजनी–भर¸ जीवन–भर¸
धोता वसुधा का अन्तस्तल।
यह लघु सरिता का बहता जल।।
मिलता है उसको जब पथ पर
पथ रोके खड़ा कठिन पत्थर
आकुल आतुर दुख से कातर
सिर पटक पटक कर रो रो कर
करता है कितना कोलाहल
यह लघु सरित का बहता जल।।
हिम के पत्थर वे पिघल–पिघल¸
बन गये धरा का वारि विमल¸
सुख पाता जिससे पथिक विकल¸
पी–पीकर अंजलि भर मृदु जल¸
नित जल कर भी कितना शीतल।
यह लघु सरिता का बहता जल।।
कितना कोमल¸ कितना वत्सल¸
रे! जननी का वह अन्तस्तल¸
जिसका यह शीतल करूणा जल¸
बहता रहता युग–युग अविरल¸
गंगा¸ यमुना¸ सरयू निर्मल
यह लघु सरिता का बहता जल।।
गोपाल सिंह नेपाली की यह कविता मैने करीब 30 साल पहले अपने बचपन में पाठ्यपुस्तक में पढ़ी थी। आज यूनुस साहब के ब्लाग पर यह कविता दिखी तो मैने उसे कापी कर अपने ब्लाग पर पोस्ट करने की धृष्टता की।

उसके बाद से जब भी मैं वहां गया एक-दो घंटे लिद्दर के किनारे गुजारे ही। पहलगाम में लिद्दर के किनारे एक छोटी सी काटेज है, जिसके तीन तरफ से मन का विह्वल जल है जो मन को विह्वल करता है। यह काटेज रुकने की मेरी सबसे पसंदीदा जगह है। फिलहाल आप भी इस कविता का आनंद लें। जिन लोगों ने लिद्दर को देखा हो, वे लिद्दर को महसूस करें और जिन्होंने नहीं देखा वे इस कविता को पढ़कर लिद्दर की कल्पना कर सकते हैं-

यह लघु सरिता का बहता जल
कितना शीतल¸ कितना निर्मल¸
हिमगिरि के हिम से निकल–निकल¸
यह विमल दूध–सा हिम का जल¸
कर–कर निनाद कल–कल¸ छल–छल
बहता आता नीचे पल पल
तन का चंचल मन का विह्वल।
यह लघु सरिता का बहता जल।।
निर्मल जल की यह तेज़ धार
करके कितनी श्रृंखला पार
बहती रहती है लगातार
गिरती उठती है बार बार
रखता है तन में उतना बल
यह लघु सरिता का बहता जल।।
एकांत प्रांत निर्जन निर्जन
यह वसुधा के हिमगिरि का वन
रहता मंजुल मुखरित क्षण क्षण
लगता जैसे नंदन कानन
करता है जंगल में मंगल
यह लघु सरित का बहता जल।।
ऊँचे शिखरों से उतर–उतर¸
गिर–गिर गिरि की चट्टानों पर¸
कंकड़–कंकड़ पैदल चलकर¸
दिन–भर¸ रजनी–भर¸ जीवन–भर¸
धोता वसुधा का अन्तस्तल।
यह लघु सरिता का बहता जल।।
मिलता है उसको जब पथ पर
पथ रोके खड़ा कठिन पत्थर
आकुल आतुर दुख से कातर
सिर पटक पटक कर रो रो कर
करता है कितना कोलाहल
यह लघु सरित का बहता जल।।
हिम के पत्थर वे पिघल–पिघल¸
बन गये धरा का वारि विमल¸
सुख पाता जिससे पथिक विकल¸
पी–पीकर अंजलि भर मृदु जल¸
नित जल कर भी कितना शीतल।
यह लघु सरिता का बहता जल।।
कितना कोमल¸ कितना वत्सल¸
रे! जननी का वह अन्तस्तल¸
जिसका यह शीतल करूणा जल¸
बहता रहता युग–युग अविरल¸
गंगा¸ यमुना¸ सरयू निर्मल
यह लघु सरिता का बहता जल।।
गोपाल सिंह नेपाली की यह कविता मैने करीब 30 साल पहले अपने बचपन में पाठ्यपुस्तक में पढ़ी थी। आज यूनुस साहब के ब्लाग पर यह कविता दिखी तो मैने उसे कापी कर अपने ब्लाग पर पोस्ट करने की धृष्टता की।
मंगलवार, 4 दिसंबर 2007
चिली के एक कवि की कविता
दुनिया की हर शै अलविदा कहेगी
दोपहर, सूर्य जीवन, सब खत्म होगा
बुरे लोग तो होंगे ही, वे मिटेंगे नहीं
पर, तुम होगी
सिर्फ तुम
मेरी जीवन
हमेशा मेरे साथ
कभी जुदा नहीं हो
-अल्बर्टो बाल्दिया
(पाब्लो नेरुदा अल्बर्टो को लाश कहकर चिढ़ाते थे)
दोपहर, सूर्य जीवन, सब खत्म होगा
बुरे लोग तो होंगे ही, वे मिटेंगे नहीं
पर, तुम होगी
सिर्फ तुम
मेरी जीवन
हमेशा मेरे साथ
कभी जुदा नहीं हो
-अल्बर्टो बाल्दिया
(पाब्लो नेरुदा अल्बर्टो को लाश कहकर चिढ़ाते थे)
धूमिल की कविता के अंश
हर तरफ धुआं है
हर तरफ कुहासा है
जो दांतों और दलदलों का दलाल है
वही देशभक्त है
अंधकार में सुरक्षित होने का नाम है-
तटस्थता। यहां
कायरता के चेहरे पर
सबसे ज्यादा रक्त है।
जिसके पास थाली है
हर भूखा आदमी
उसके लिए, सबसे भद्दी
गाली है
हर तरफ कुआं है
हर तरफ खाईं है
यहां, सिर्फ, वह आदमी, देश के करीब है
जो या तो मूर्ख है
या फिर गरीब है
हर तरफ कुहासा है
जो दांतों और दलदलों का दलाल है
वही देशभक्त है
अंधकार में सुरक्षित होने का नाम है-
तटस्थता। यहां
कायरता के चेहरे पर
सबसे ज्यादा रक्त है।
जिसके पास थाली है
हर भूखा आदमी
उसके लिए, सबसे भद्दी
गाली है
हर तरफ कुआं है
हर तरफ खाईं है
यहां, सिर्फ, वह आदमी, देश के करीब है
जो या तो मूर्ख है
या फिर गरीब है
रविवार, 2 दिसंबर 2007
शनिवार, 1 दिसंबर 2007
त्रिलोचन की एक और कविता
सह जाओ आघात प्राण, नीरव सह जाओ
इसी तरह पाषाण अद्रि से गिरा करेंगे
कोमल-कोमल जीव सर्वदा घिरा करेंगे
कुचल जाएंगे और जाएंगे। मत रह जाओ
आश्रय सुख में लीन। उठो। उठ कर कह जाओ
प्राणों के संदेश, नहीं तो फिरा करेंगे
अन्य प्राण उद्विग्न, विपज्जल तिरा करेंगे
एकाकी। असहाय अश्रु में मत बह जाओ।
यह अनंत आकाश तुम्हे यदि कण जानेगा
तो अपना आसन्य तुम्हे कितने दिन देगा
यह वसुधा भी खिन्न दिखेगी, क्षण जानेगा
कोई नि:स्वक प्राण, तेज के कण गिन देगा
गणकों का संदोह, देह व्रण जानेगा
और शून्य प्रासाद बनाएगा चिन देगा
इसी तरह पाषाण अद्रि से गिरा करेंगे
कोमल-कोमल जीव सर्वदा घिरा करेंगे
कुचल जाएंगे और जाएंगे। मत रह जाओ
आश्रय सुख में लीन। उठो। उठ कर कह जाओ
प्राणों के संदेश, नहीं तो फिरा करेंगे
अन्य प्राण उद्विग्न, विपज्जल तिरा करेंगे
एकाकी। असहाय अश्रु में मत बह जाओ।
यह अनंत आकाश तुम्हे यदि कण जानेगा
तो अपना आसन्य तुम्हे कितने दिन देगा
यह वसुधा भी खिन्न दिखेगी, क्षण जानेगा
कोई नि:स्वक प्राण, तेज के कण गिन देगा
गणकों का संदोह, देह व्रण जानेगा
और शून्य प्रासाद बनाएगा चिन देगा
न तो दुनिया से लेफ्ट उठ रहा है और न इंसानियत की विचारधारा
विवेक सत्य मित्रम के पोस्ट क्या गैर वामपंथी होना गुनाह है पर-
1.गैर वामपंथी होना या न होना गुनाह या पुण्य से जुड़ा नहीं है लेकिन इंसानियत की विचारधारा की बात करने वाले को यह सवाल शोभा नहीं देता। लगता है मित्रम जी करात, बुद्धदेव, वर्धन, नीलोत्पल बसु, आईसा, एसएफआई आदि से ही लेफ्ट की विचारधारा को समझते हैं। न तो दुनिया से लेफ्ट उठ रहा है और न इंसानियत की विचारधारा। वैसे दोनों एक-दूसरे के पर्याय ही हैं। इंसानियत की अगर कोई विचारधारा है तो वह बुद्ध-गुरू गोविंद सिंह-मार्क्स-लेनिन-माओ के रास्ते ही निकली है। नेपोलियन-जार-हिटलर-मुसोलिनी-गुरू गोलवलकर-बुश-लादेन-तोगड़िया-आडवाणी के रास्ते नहीं। सिर्फ लेफ्ट ही इंसान की बराबरी और उसके जीने की हक की बात करता है। बाकी तो अमीर बने रहने के लिए गरीबी बनाए रखने (इंसान के शोषण) की अनिवार्यता ही जताते हैं।
2. दुखद यह है कि अधकचरी समझ के चलते छल्लों-दुमछल्लों को लेफ्ट मानकर इस महान विचारधारा का आकलन किया जा रहा है।
3. आप कहते हैं कि आप कनफ्यूज्ड नहीं हैं लेकिन हैं आप भयंकर रूप से कनफ्यूज्ड। भारत के लेफ्ट ग्रुप्स के बारे में भी आपकी जानकारी अधकचरी है। किसी की सही आलोचना आप तब तक नहीं कर सकते जब तक आप उसे पूरी तरह से जान न लें। प्रकाश करात और दीपांकर भट्टाचार्य के अंतर को समझना ही पड़ेगा।
4. माफ करिएगा आपका यह ब्लाग बोगस वाम विरोधियों का अड्डा बनता नजर आ रहा है।
1.गैर वामपंथी होना या न होना गुनाह या पुण्य से जुड़ा नहीं है लेकिन इंसानियत की विचारधारा की बात करने वाले को यह सवाल शोभा नहीं देता। लगता है मित्रम जी करात, बुद्धदेव, वर्धन, नीलोत्पल बसु, आईसा, एसएफआई आदि से ही लेफ्ट की विचारधारा को समझते हैं। न तो दुनिया से लेफ्ट उठ रहा है और न इंसानियत की विचारधारा। वैसे दोनों एक-दूसरे के पर्याय ही हैं। इंसानियत की अगर कोई विचारधारा है तो वह बुद्ध-गुरू गोविंद सिंह-मार्क्स-लेनिन-माओ के रास्ते ही निकली है। नेपोलियन-जार-हिटलर-मुसोलिनी-गुरू गोलवलकर-बुश-लादेन-तोगड़िया-आडवाणी के रास्ते नहीं। सिर्फ लेफ्ट ही इंसान की बराबरी और उसके जीने की हक की बात करता है। बाकी तो अमीर बने रहने के लिए गरीबी बनाए रखने (इंसान के शोषण) की अनिवार्यता ही जताते हैं।
2. दुखद यह है कि अधकचरी समझ के चलते छल्लों-दुमछल्लों को लेफ्ट मानकर इस महान विचारधारा का आकलन किया जा रहा है।
3. आप कहते हैं कि आप कनफ्यूज्ड नहीं हैं लेकिन हैं आप भयंकर रूप से कनफ्यूज्ड। भारत के लेफ्ट ग्रुप्स के बारे में भी आपकी जानकारी अधकचरी है। किसी की सही आलोचना आप तब तक नहीं कर सकते जब तक आप उसे पूरी तरह से जान न लें। प्रकाश करात और दीपांकर भट्टाचार्य के अंतर को समझना ही पड़ेगा।
4. माफ करिएगा आपका यह ब्लाग बोगस वाम विरोधियों का अड्डा बनता नजर आ रहा है।
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