वह उसकी शादी से लौट रहा था। लड़की का एक दोस्त भी उसके साथ था। स्टेशन पर वे लेट होती ट्रेन का इंतजार कर रहे थे। वह उस लड़की के बारे में सोच रहा था-कैसे वह उसके हास्टल आती थी, क्या बातें करती थी, कैसे उससे हाथ मिलाती थी और कई दिन बाद मिलती थी तो गले लगा लेती थी। वह इन सबके अर्थ निकालने की कोशिश भी कर रहा था सबको जोड़कर। ट्रेन आने को हुई। तो लड़की के दोस्त ने कहा कि चलो चाय पीते हैं तब तक ट्रेन आ जाएगी। वह चाय की दुकान पर गया कल्पना की दुनिया को बिना छोड़े। तब तक ट्रेन एनाउंस हो गई। तो लड़की के दोस्त ने चाय वाले से कहा एक में दो कर देना। वह अद्धी चाय पी रहा था। चाय खत्म हुई और ट्रेन आ गई। उसने लड़की के दोस्त से पूछा-क्या कोई लड़की दो लड़कों से प्यार नहीं कर सकती?
गुरुवार, 29 नवंबर 2007
मोहब्बतें- क्या वह दो लोगों से प्यार नहीं कर सकती?
वह उसकी शादी से लौट रहा था। लड़की का एक दोस्त भी उसके साथ था। स्टेशन पर वे लेट होती ट्रेन का इंतजार कर रहे थे। वह उस लड़की के बारे में सोच रहा था-कैसे वह उसके हास्टल आती थी, क्या बातें करती थी, कैसे उससे हाथ मिलाती थी और कई दिन बाद मिलती थी तो गले लगा लेती थी। वह इन सबके अर्थ निकालने की कोशिश भी कर रहा था सबको जोड़कर। ट्रेन आने को हुई। तो लड़की के दोस्त ने कहा कि चलो चाय पीते हैं तब तक ट्रेन आ जाएगी। वह चाय की दुकान पर गया कल्पना की दुनिया को बिना छोड़े। तब तक ट्रेन एनाउंस हो गई। तो लड़की के दोस्त ने चाय वाले से कहा एक में दो कर देना। वह अद्धी चाय पी रहा था। चाय खत्म हुई और ट्रेन आ गई। उसने लड़की के दोस्त से पूछा-क्या कोई लड़की दो लड़कों से प्यार नहीं कर सकती?
मोहब्बतें - वह मोहब्बत करना चाहती है

उसे लगता था कि वह सेक्सी नहीं है। कोई पुरुष उसकी तरफ नहीं आकर्षित होगा। उसकी दुनिया बस अपने बच्चों व पति तक सीमित थी। जब वह स्कूल में पढ़ती थी, तो एक लड़का उसे देखता था। लेकिन जैसे ही 12वीं पास हुई, उसकी शादी हो गई। और वह एक खिलंदड़ लड़की से दुनियादार औरत बन गई। दिन गुजरते रहे, पहले बेटा हुआ और फिर एक बेटी। 25 की होते-होते वह बच्चे पैदा करने के काम से निवृत्त हो गए। उसका दिन अपने पेरेंट्स-इनलाज व सेठानियों की किटी पार्टियों के बीच गुजरता और रात पति की झिड़की सुन-सुन कर या उसकी जरूरतें पूरी करके।
पति का कारोबार तेजी से बढ़ा और घर के कंप्यूटर में इंटरनेट लग गया। उसके पास इफरात में समय था सो नेट सर्फ करती रहती। एक दिन वह एक एडल्ट चैट साइट पर गई और उसकी मुलाकात एक 40 साल के आदमी से हुई। एक-दो दिन चैटिंग चली और फिर फोन पर आ गए। उसने बताया कि उसमें कोई आकर्षण नहीं है। बच्चों के बाद वह थोड़ी बल्की हो गई थी और पति लगातार कहता रहता था कि तुम को तो कोई देखेगा भी नहीं। उस आदमी ने कहा, मैने तुम्हे देखा तो नहीं लेकिन तुम्हारी आवाज में इतनी कशिश है कि हो ही नहीं सकता तुम आकर्षक न हो। उसने कहा, तुम मुझे देख लोगे तो भाग जाओगे। धीरे-धीरे दोनों वेबकैम पर आ गए। एक-दूसरे को देखा। आदमी ने कहा, तुम में तो कोंकणा सेन जैसी लुनाई है। भला तुम्हारी तरफ कोई आकर्षित हुए बिना कैसे रह सकता। उसे अच्छा लगा। वह उस आदमी से अपनी बातें शेयर करने लगी।
एक दिन उसने उस आदमी को फोन किया और रोने लगी- मैं मरने जा रही हूं, मेरे जीने का कोई मतलब नहीं। उस आदमी ने उससे कारण जाना तो पता चला कि उस रात पति ने पिटाई की और कहा है कि तुम पर तो कोई थूकेगा भी नहीं। तुम्हारा काम है मेरे बच्चे पालना, इसी में तुम खुश रहो। नहीं जहां चाहो चली जाओ। वह घर से निकल आई थी नीलकमल की तरह और एक पीसीओ से फोन कर रही थी। आदमी ने उसे समझाया कि घर जाओ, तुम इतनी इंटेलीजेंट हो और ऐसे फैसले ले रही हो।
अब वह अलग कमरे में सोने लगी। उसने अलकेमिस्ट पढ़ी और फिर सेकेंड सेक्स। उसे लगा कि वह भी उतनी ही इंसान है जितना उसका पति। एक रात उसने उस आदमी को फोन किया और रात में फोन का सिलसिला चल निकला। दोनों फोन पर बातें करते-करते पहले रुहानी और फिर जिस्मानी खयालों में डूब जाते। इसके लिए उसने अपने पति से छिपाकर एक सेलफोन भी ले लिया। लेकिन एक रात उसके पति ने सुन लिया। फिर क्या था, खासा बखेड़ा। पति ने लड़की के पेरेंट्स को बुलाया और कहा ले जाएं अपनी लड़की। वह तो रात में छिपकर मर्दों से बात करती है। पति ने उस आदमी को भी फोन किया और चेतावनी दी कि उसकी पत्नी को फोन करने से बाज आए नहीं तो वह पुलिस भेजेगा।
कुछ दिन तनाव चला। उस आदमी से बातचीत कुछ दिन बंद रही। फिर उसने आदमी को फोन किया कि तुम तो बहुत स्वार्थी निकले। मैने तो तुमको दिल से अपना सबकुछ माना और वह सब तुमसे शेयर करती रही जो मैने अपने पति से भी शेयर नहीं किया। मुझे उम्मीद थी, तुम मुझे लेने आ जाओगे। आदमी ने किसी तरह उसे समझाया कि बस शादी नहीं कर सकता, बाकी हर तरह से मदद के लिए वह तैयार है।
लेकिन उसके मन में बहुत कुछ खदबदा रहा था, वह नेट पर लोगों की राय इस मसले पर मांगने लगी और फिर उस आदमी को उस साइट पर जाने को कहा। वह आदमी साइट पर गया तो वहां जितने जवाब थे सब उस आदमी की ईमानदारी पर ही सवालिया निशान लगा रहे थे। लेकिन दोनों की घनिष्ठता कायम रही। खयालों की यह मोहब्बत फिर तेज रफ्तार पकड़ने लगी, यहां तक कि जब वह पति के साथ होती तो इसी आदमी के बारे में सोचती। उसने अपनी दबी हुई सेक्स इच्छाएं भी बताईं और खयालों में उन्हें पूरा भी करती रहती। लेकिन यह जरूर कहती कि वह सिर्फ मांस का लोथड़ा नहीं है। इस बीच नेट पर सलाह देने वाले एक व्यक्ति ने उससे चैट करना शुरू किया। उसने उससे पहले आदमी के बारे में भी बताया और यह भी कि वह इस आदमी से हर तरह से जुड़ चुकी है। दूसरे आदमी से भी फोन पर बातें शुरू हो गईं। वह पहले आदमी को इसके बारे में सबकुछ बताती। सेल पर उस आदमी से की बातचीत टेप करती और पहले आदमी को सुनाती। तभी फिर उसके पति ने फोन पर बात पकड़ ली और इस बार उसने घर पर वकील भेज दिया तलाक के लिए। उसने दूसरे आदमी को बताया। उसने उसके पति को फोन किया और हड़काया कि तुम कैसे आदमी हो, अपनी पत्नी पर संदेह करते हो। मैं आऊंगा और तुम दोनों से बात करूंगा। उसे बहुत अच्छा लगा और उसने पहले आदमी को बताया कि दूसरा आदमी कितना हिम्मती है। तुम तो आने के नाम से ही दूर भागते हो।
फिर दूसरा आदमी उसके शहर आया, पति ने गाड़ी भेजी, होटल बुक कराया और अपनी पत्नी के साथ मिलने गया। दोनों ने उसे बाहर बैठाकर एक घंटे बात की। फिर सब सामान्य होता दिखा। वह खुश थी। उसने पहले आदमी को सबकुछ बताया किसे दूसरे आदमी ने इंटेलीजेंटली पति को समझा दिया है। लेकिन अब दूसरा आदमी रोज उसे फोन करने लगा और एसएमएस भी। वह समझ नहीं पा रही थी। धीरे-धीरे पहला आदमी दूर होने लगा, क्योंकि पहला आदमी जब फोन करता तो इंगेज्ड मिलता। बात कम हो गई। एक दिन उसने पहले आदमी को फोन किया कि दूसरा आदमी उसे दिलोजान से प्यार करता है। उसकी समझ में नहीं आ रहा, क्या करे।
इस बीच पति ने फिर पिटाई कर दी। दूसरे आदमी को उसने फोन किया। दूसरे आदमी ने कहा कि वह तैयार रहे उसके साथ जाने को। उसने शादी की बात की। वह बहुत उत्साहित थी, पहले आदमी को बताया कि वे दोनों चुपचाप शादी कर लेंगे। पहले आदमी ने नई जिंदगी के लिए बधाई दी लेकिन सलाह भी कि वह ठंडे दिमाग से सोच ले कि बच्चों का क्या होगा, दूसरे आदमी की पत्नी कहां जाएगी, दूसरे आदमी के बच्चों की क्या गलती है। एक हफ्ते बाद उसने पहले आदमी को बताया कि उसने मना कर दिया है
च लेकिन उहापोह जारी है। वह कहती है कि मैं तो तुम से ही मोहब्बत करती हूं। तुम उतने हिम्मती क्यों नहीं निकले।...कहानी अभी जारी है... देखना है कायनात इस औरत की इच्छाएं पूरी करने के लिए साजिशें करती है या नहीं।...
बुधवार, 28 नवंबर 2007
मोहब्बतें - उनकी मोहब्बत बढ़ी और दुनिया से खुशी कम होती रही

ब्लाग के अखाड़े में उदास मुगदर की लवस्टोरीज देखकर मुझे लगा कि मैं भी कीबोर्ड भांज सकता हूं मोहब्बत के किस्सों पर। शुरू कर रहा हूं। मुगदर की तरह मैं 563 जैसा कोई नंबर तो नहीं तय कर पा रहा हूं लेकिन देखते हैं...
अलबामा में 53 साल पहले पैदा हुई थी, इसी माह की किसी तारीख को। उत्तरी अमेरिका के इस हिस्से में आज भी जातीय भावनाएं कायम हैं, तब तो वहां काले लोग अछूत ही माने जाते थे। वे बसों में पीछे ही बैठ सकते थे, उनके रेस्टोरेंट्स अलग थे। उसने भी सहा। सर्कस देखने गई तो बाहर कर दी गई, होटल में रूम नहीं मिला, यही नहीं, डिपार्टमेंटल स्टोर में कपड़े खरीदे तो उसे फिटिंग चेक करने के लिए ट्रायल रूम में नहीं स्टोररूम में जगह मिली (ट्रायलरूम में सिर्फ गोरे जा सकते थे)। 1963 में उसके साथ जो घटना हुई, आज तक नहीं भूली वह। कालों को निशाना बनाकर बमिंघम चर्च में हुए बम विस्फोट में उसकी दोस्त समेत चार काली लड़कियां मारी गईं। उसने भी धमाके देखे और सुने। वह कहती है, उस दृश्य और आवाज को मैं कभी न भूल पाऊंगी। लेकिन वह नागरिक अधिकारों के लिए लड़ने वाली इंसान न बन सकी। उसका पारिवारिक बैकग्राउंड कानफर्मिस्ट नेचर का था। उसने अपना ध्येय बनाया खूब मेहनत करना और गोरों से दोगुना बेहतर बनना। पिता ने मंत्र दिया कि व्यवस्था से टकराओ नहीं, मेहनत करो, आगे बढ़ो और व्यवस्था का फायदा उठाओ।
उसने यही किया। तीन साल की उम्र से फ्रेंच सीखना शुरू किया। स्केटिंग उसका पसंदीदा गेम था और बैले अपनी भावनाओं को विस्तार देने का साधन। वायलिन बजाना उसे अच्छा लगता था और वह चाहती थी अच्छी वायलिनवादक बने लेकिन इससे जीवनयापन मुश्किल था सो उसने इरादा बदला। जब यूनिवसिर्टी पहुंची, कोल्ड वार में रुचि बढ़ी और फिर सोवियत संघ पर एक लेक्चर सुना तो राह ही बदल गई। उसने मिलिटरी डाक्टराइन और चेकोस्लोवाकिया पर पीएचडी की और पहुंच गई स्टैनफोर्ड यूनिवसिर्टी में पढ़ाने। वहां वह रिपब्लिकन हो गई और मौका मिला अमेरिकी राष्ट्रपति को सोवियत मामलों पर सलाह देने का।
उसकी मुलाकात राष्ट्रपति के बेटे से हुई। दिन निकलते रहे। राष्ट्रपति के बेटे के सितारे बुलंद हुए और साथ ही उसके भी। उसने न शादी की और न मोहब्बत का इजहार (शायद)। हां एक बार गलती से राष्ट्रपति के बेटे को अपना हसबैंड जरूर बोल गई, जाने कैसे। लेकिन बुलंद सितारों के साथ ही शुरू हुई असफलताओं की कहानी। 9/11 से शुरू होकर यह सफर आज भी जारी है। अफगानिस्तान, इराक और अब ईरान इसी मोहब्बत की गर्माहट में झुलस रहे हैं और साथ में पूरी दुनिया।
वह बताती है कि जब मैं चार साल की थी, मेरे पिता ने मेरी एक फोटो ली थी जिसमें मैं सांताक्लाज की गोद में थी और यकीन करिए फोटो में मेरे चेहरे के भाव दूरियों वाले थे क्योंकि मैं कभी किसी गोरे के इतने करीब पहले कभी नहीं गई थी। लेकिन अब उसके चेहरे पर आश्वस्ति के भाव दिखाई देते हैं। आज भी वह अच्छी वायलिन बजाती है।
चम्पा काले काले अच्छर नहीं चीन्हती
त्रिलोचन जी ने बनारस में एक बार यह कविता सुनाई थी और तब से यह कविता भूली नहीं। लेकिन बाबा इससे भी ज्यादा मगन होकर निराला की कविता राम की शक्ति पूजा सुनाते हैं।
चम्पा काले काले अच्छर नहीं चीन्हती
मैं जब पढ़ने लगता हूँ वह आ जाती है
खड़ी खड़ी चुपचाप सुना करती है
उसे बड़ा अचरज होता है:
इन काले चिन्हों से
कैसे ये सब स्वर निकला करते हैं.
चम्पा सुन्दर की लड़की है
सुन्दर ग्वाला है : गाय भैसे रखता है
चम्पा चौपायों को लेकर
चरवाही करने जाती है
चम्पा अच्छी है चंचल है
न ट ख ट भी है
कभी कभी ऊधम करती है
कभी कभी वह कलम चुरा देती है
जैसे तैसे उसे ढूंढ कर जब लाता हूँ
पाता हूँ - अब कागज गायब
परेशान फिर हो जाता हूँ
चम्पा कहती है:
तुम कागद ही गोदा करते हो दिन भर
क्या यह काम बहुत अच्छा है
यह सुनकर मैं हँस देता हूँ
फिर चम्पा चुप हो जाती है
उस दिन चम्पा आई , मैने कहा कि
चम्पा, तुम भी पढ़ लो
हारे गाढ़े काम सरेगा
गांधी बाबा की इच्छा है -
सब जन पढ़ना लिखना सीखें
चम्पा ने यह कहा कि
मैं तो नहीं पढ़ूंगी तुम तो कहते थे
गांधी बाबा अच्छे हैं
वे पढ़ने लिखने की कैसे बात कहेंगे
मैं तो नहीं पढ़ूंगी
मैने कहा चम्पा, पढ़ लेना अच्छा है
ब्याह तुम्हारा होगा , तुम गौने जाओगी,
कुछ दिन बालम सँग साथ रह चला जायेगा जब कलकत्ता
बड़ी दूर है वह कलकत्ता
कैसे उसे सँदेसा दोगी
कैसे उसके पत्र पढ़ोगी
चम्पा पढ़ लेना अच्छा है!
चम्पा बोली : तुम कितने झूठे हो ,
देखा ,हाय राम , तुम पढ़-लिख कर इतने झूठे हो
मैं तो ब्याह कभी न करुंगी
और कहीं जो ब्याह हो गया
तो मैं अपने बालम को संग साथ रखूंगी
कलकत्ता मैं कभी न जाने दूंगी
कलकत्ता पर बजर गिरे।
चम्पा काले काले अच्छर नहीं चीन्हती
मैं जब पढ़ने लगता हूँ वह आ जाती है
खड़ी खड़ी चुपचाप सुना करती है
उसे बड़ा अचरज होता है:
इन काले चिन्हों से
कैसे ये सब स्वर निकला करते हैं.
चम्पा सुन्दर की लड़की है
सुन्दर ग्वाला है : गाय भैसे रखता है
चम्पा चौपायों को लेकर
चरवाही करने जाती है
चम्पा अच्छी है चंचल है
न ट ख ट भी है
कभी कभी ऊधम करती है
कभी कभी वह कलम चुरा देती है
जैसे तैसे उसे ढूंढ कर जब लाता हूँ
पाता हूँ - अब कागज गायब
परेशान फिर हो जाता हूँ
चम्पा कहती है:
तुम कागद ही गोदा करते हो दिन भर
क्या यह काम बहुत अच्छा है
यह सुनकर मैं हँस देता हूँ
फिर चम्पा चुप हो जाती है
उस दिन चम्पा आई , मैने कहा कि
चम्पा, तुम भी पढ़ लो
हारे गाढ़े काम सरेगा
गांधी बाबा की इच्छा है -
सब जन पढ़ना लिखना सीखें
चम्पा ने यह कहा कि
मैं तो नहीं पढ़ूंगी तुम तो कहते थे
गांधी बाबा अच्छे हैं
वे पढ़ने लिखने की कैसे बात कहेंगे
मैं तो नहीं पढ़ूंगी
मैने कहा चम्पा, पढ़ लेना अच्छा है
ब्याह तुम्हारा होगा , तुम गौने जाओगी,
कुछ दिन बालम सँग साथ रह चला जायेगा जब कलकत्ता
बड़ी दूर है वह कलकत्ता
कैसे उसे सँदेसा दोगी
कैसे उसके पत्र पढ़ोगी
चम्पा पढ़ लेना अच्छा है!
चम्पा बोली : तुम कितने झूठे हो ,
देखा ,हाय राम , तुम पढ़-लिख कर इतने झूठे हो
मैं तो ब्याह कभी न करुंगी
और कहीं जो ब्याह हो गया
तो मैं अपने बालम को संग साथ रखूंगी
कलकत्ता मैं कभी न जाने दूंगी
कलकत्ता पर बजर गिरे।
मंगलवार, 27 नवंबर 2007
सर्वे रिजल्ट - क्या समाजवाद-जनवाद आम जनता को गरिया कर आएगा (फिलहाल अंतिम किस्त)
क्या समाजवाद-जनवाद आम जनता को गाली देकर आएगा-
19 लोगों ने वोट डाले।
13 ने कहा - कतई नहीं
6 ने कहा - हां
6 लोग जिन्होंने हां कहा, वे वह होंगे जो यह मानते हैं कि समाजवाद-जनवाद प्रतिक्रियावादी बनने से नहीं, क्रियावादी बनने से ही आ सकता है और चिढ़कर उनने हां पर क्लिक किया होगा।
बाकी 19 के बारे में निश्चित तौर पर कुछ कह नहीं सकता।
19 लोगों ने वोट डाले।
13 ने कहा - कतई नहीं
6 ने कहा - हां
6 लोग जिन्होंने हां कहा, वे वह होंगे जो यह मानते हैं कि समाजवाद-जनवाद प्रतिक्रियावादी बनने से नहीं, क्रियावादी बनने से ही आ सकता है और चिढ़कर उनने हां पर क्लिक किया होगा।
बाकी 19 के बारे में निश्चित तौर पर कुछ कह नहीं सकता।
रविवार, 25 नवंबर 2007
त्रिलोचन का अपमान मत करो यारों-4
मैने त्रिलोचन का अपमान मत करो यारों-2 में उनकी रचनाओं की रायल्टी को लेकर बात की थी। किन्हीं बेनामी जी ने आज उस पोस्ट पर अपनी टिप्पणी में जो जानकारी दी, वह वाकई बहुत निराशाजनक है। लेकिन बेनामी जी ने जो तल्ख भाषा अनुनाद सिंह जी के लिए इस्तेमाल की, उससे लगता है कि वे भी उसी कथित जनवादी लिबरेशन वाले हैं जो अपने हीरोज का इस्तेमाल करना जानते हैं लेकिन उनके लिए लड़ना नहीं।
बेनामी ने कहा…
त्रिलोचन जी की समस्त रोयल्टी की राशि पान्च सौ रुपया सालाना है। अनुनाद सिन्ह जी, हिन्दी भाषा के महान लेखको की आर्थिक दशा को क्रिपया जानिये। आपका वक्तव्य किसी क्रूर असान्स्क्रितिक रईस का वक्तव्य लगता है।
मेरे मन में सवाल यह उठ रहा है कि राजकमल जैसे प्रकाशन बाबा जैसे लोगों को बेचकर करोड़ों कमा रहे हैं, इस शोषण के खिलाफ जनवादी कब लड़ाई लड़ेंगे। अपने शोषण के खिलाफ भी खड़े हुआ जाए। सिर्फ जनता को गरियाते रहने से काम नहीं चलने वाला।
क्या बाबा त्रिलोचन, बाबा नागार्जुन जैसे जनकवियों की रचनाओं से शोषक प्रकाशक ऐसे ही करोड़ों कमाते रहते दिया जाएगा। मान लीजिए हमारे जैसे भ्रष्ट और लालची (जनवादियों ने हमें इन्हीं विशेषणों से नवाजा है) लोग और कुछ नहीं कर सकते तो कम से कम इस ब्लागजगत में तो एक कैंपेन चला सकते हैं, शायद कुछ असर हो और जनवादियों पर भी दबाव बने कि वे लोग ऐसे प्रकाशकों को छोड़ें (दिल्ली में जनवादियों की रोजीरोटी का अड्डा ये शोषक प्रकाशक भी हैं)।
बेनामी ने कहा…
त्रिलोचन जी की समस्त रोयल्टी की राशि पान्च सौ रुपया सालाना है। अनुनाद सिन्ह जी, हिन्दी भाषा के महान लेखको की आर्थिक दशा को क्रिपया जानिये। आपका वक्तव्य किसी क्रूर असान्स्क्रितिक रईस का वक्तव्य लगता है।
मेरे मन में सवाल यह उठ रहा है कि राजकमल जैसे प्रकाशन बाबा जैसे लोगों को बेचकर करोड़ों कमा रहे हैं, इस शोषण के खिलाफ जनवादी कब लड़ाई लड़ेंगे। अपने शोषण के खिलाफ भी खड़े हुआ जाए। सिर्फ जनता को गरियाते रहने से काम नहीं चलने वाला।
क्या बाबा त्रिलोचन, बाबा नागार्जुन जैसे जनकवियों की रचनाओं से शोषक प्रकाशक ऐसे ही करोड़ों कमाते रहते दिया जाएगा। मान लीजिए हमारे जैसे भ्रष्ट और लालची (जनवादियों ने हमें इन्हीं विशेषणों से नवाजा है) लोग और कुछ नहीं कर सकते तो कम से कम इस ब्लागजगत में तो एक कैंपेन चला सकते हैं, शायद कुछ असर हो और जनवादियों पर भी दबाव बने कि वे लोग ऐसे प्रकाशकों को छोड़ें (दिल्ली में जनवादियों की रोजीरोटी का अड्डा ये शोषक प्रकाशक भी हैं)।
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