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गुरुवार, 22 नवंबर 2007

तेल की धार देखिए

सउदी अरब ओपेक सदस्य वेनेजुएला के राष्ट्रपति शावेज और ईरान के राष्ट्रपति अहमदीनेजाद को आमंत्रित कर रहा है और बात तेल की कीमतों पर होगी। यह बैठक बीते दिसंबर से प्लान की जा रही थी और अब ऐसे समय पर होने जा रही है जब तेल की कीमते 100 डालर प्रति बैरल के आसपास मंडरा रही हैं और डालर कमजोर होता जा रहा है। हालांकि यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि ओपेक में दरार पड़ गई है लेकिन इसकी शुरुआत होती दिखाई दे रही है। इस कदम से सउदी अरब दुनिया को यह भरोसा देना चाहता है कि ओपेक तेल का विश्वसनीय सप्लायर बना रहेगा लेकिन शावेज व अहमदीनेजाद ओपेक में अपने अमेरिका विरोधी रवैये के लिए जाने जाते रहे हैं। इन दोनों का मानना है कि तेल कीमते बहुत ज्यादा नहीं है। शावेज लगातार इस कोशिश में हैं कि तेल से अमेरिका की मोनोपली खत्म की जाए। यहां तक कि वे समांतर ओपेक का संकेत भी दे चुके हैं। शावेज को कमजोर करने की अमेरिकी कोशिशें सफल होती तो दिखाई नहीं दे रहीं, उपर से शावेज अपने देश में अगले माह से नया संविधान लागू करने जा रहे हैं जिसके जरिए वेनेजुएला की हर प्रशासनिक इकाई पर उनके ही लोग बैठ सकेंगे।

2010 तक ब्राडबैंड भी कछुआ चाल हो जाएगा

अभी आप अपने ब्राडबैंड कनेक्शन की स्पीड का मजा ले रहे हैं लेकिन 2010 तक इसकी स्पीड भी झेलाऊ हो जाएगी। जितनी तेजी से इंटरनेट का इस्तेमाल फोन, वीडियो और इंटरैक्टिव सर्विसेज के लिए बढ़ रहा है, 2010 तक वर्ल्ड वाइड वेब इसके लोड के नीचे दब जाएगा। अकेले यू ट्यूब ही रोजाना 27 पेटा बाइट्स (2.7 करोड़ गीगा बाइट्स) डाटा जनरेट करती है। अंदाजा लगाइए क्या स्थिति आने वाली है।

फिदेल का उत्तराधिकारी वोट से तय हो

इंटरनेशनल रिप्बलिकन इंस्टीट्यूट का क्यूबा में गुप्त सर्वें-

79 फीसदी लोग मानते हैं कि देश की मौजूदा समस्याएं मौजूदा सरकार हल नहीं कर सकती।
74 फीसदी लोग मानते हैं कि फिदेल कास्त्रो का उत्तराधिकारी वोट से चुना जाना चाहिए।
77 फीसदी क्यूबन अपने यहां की चुनाव प्रणाली बदले जाने की वकालत करते हैं।

तीन चौथाई अमेरिकी मानते हैं, उनका देश रसातल की तरफ

गैलप पोल का ताजा सर्वे

तीन चौथाई अमेरिकी मानते हैं, अमेरिका की आर्थिक स्थिति खराब होती जा रही है।
31 फीसदी अमेरिकियों की सबसे बड़ी चिंता उनके देश की खराब होती माली हालत है।
अमेरिकी अर्थशास्त्रियों की भी राय है कि आने वाले दिनों में अमेरिकी विकास दर और धीमी होगी। इस साल के अंत में इसके 1.5 फीसदी रहने के आसार हैं।

बुधवार, 21 नवंबर 2007

त्रिलोचन की कविता : अपना गला फंसाकर मैं भर पाया

संशय कर। संशय कर। संशय कर। संशय से
तू जीवन का प्रखर सत्य पाएगा। पट्टी
आंखो पर विश्वास की न ले। जग में टट्टी
ओट शिकार खेलने वाले मत्त विजय से
बिचर रहे हैं, मृग अर्धावलीढ कुश भय से
गिरा गिरा कर भाग रहे हैं। तबियत खट्टी
आज अहिंसा की है और शांति की सट्टी
मंद पड़ रही है लक्ष्य वेध कर, भढ़ चल नय से।

कल जो कहता था ईमान नहीं बेचूंगा,
वह चुपके ईमान बेचकर घर आया है,
क्या करता; परिजन हैं, संतति है, जाया है!
मन को समझा दिया, और कब तक खेंचूंगा
इनको अपने पीछे, अधिक नहीं मैं दूंगा।
अपना गला फंसा कर मैने भर पाया है।

-त्रिलोचन

रविवार, 18 नवंबर 2007

आम आदमी को गरिया कर आएगा इनका समाजवाद-जनवाद-2

लगता है कि लिबरेशन के जो लोग जनमत ब्लाग पर लिख रहे हैं, उनका पक्का विश्वास है कि आम आदमी को गरिया कर ही समाजवाद-जनवाद लाया जा सकेगा। विनोद मिश्रा की लीगैसी वाले ये लोग इतना डरे हुए क्यों हैं? नंदीग्राम को लेकर किन्ही सत्यम ने एक पोस्ट लिखी और लिबरेशन के लोग दाना-पानी लेकर उसके पीछे भी पड़ गए। ऐसी बात कर रहे हैं ये लोग जैसे कोई भी ब्लाग लिखे तो कीबोर्ड इन्हीं से मांगे, नहीं उसे कुंठित करार दे दिया जाएगा।
मेरी जो मोटी समझ है, उसके मुताबिक यदि आप सामाजिक क्रांति और एक नए समाज के निर्माण के लिए काम कर रहे हैं तो आपको आम आदमी की चिंताओं, भ्रांतियों को सहिष्णुता से साफ करना चाहिए और उसकी सोच, सपनों व आकांक्षाओं को भी समझना चाहिए। हो उल्टा रहा है। कोई यदि अपनी बात रख दे, तो ये उसे भ्रष्ट, कुंठित और न जाने क्या क्या करार दे देते हैं जिससे के वह इनसे डरे और न अपनी बात रखे और न ही इनके यहां की गड़बड़ियों पर उंगली उठाने की हिम्मत करे।
ये लोग मार्क्स से ही कुछ सीखें कि उनने उस समय के समाज को समझा, उनकी दिक्कतें समझीं, उनकी आकांक्षाएं समझीं और फिर उनके हिसाब से नए समाज का खाका दिया। साथ में मजबूत दार्शनिक व आर्थिक आधार। लेकिन ये लोग ऐसा कुछ करने की जहमत नहीं उठाना चाहते। मार्क्स की आइडियोलाजी लेकर चलना कतई गलत नहीं है लेकिन लकीर के फकीर बनकर दुर्भाग्यपूर्ण है। उनका चश्मा आज नहीं चल सकता। अब नंबर बदल गया है। दूसरा चश्मा बनाना ही पड़ेगा। ये लोग चश्मा बदलना नहीं चाहते और ऊपर से गाली-गलौज कर सबको धमकाने पर आमादा नजर आते हैं जनवादी शब्दभंडार से। मोहल्ला पर सत्यम के पोस्ट पर इन्होंने यही करने की कोशिश की है।
लेकिन हम हिंदुस्तान में रहते हैं, पाकिस्तान या चीन में नहीं जहां कुत्तों को भी भौकने के लिए जनरल या सेक्रेटरी जनरल से परमीशन लेनी पड़ती है (हमें कम से कम ये जनवादी आदमी तो मानते ही होंगे, ऐसा मैं सोचता हूं लेकिन हो सकता है कि ये हमें आदमी से कमतर और अपने को आदमी से भी बेहतर मानते हों)। और ब्लाग जितना इनका है उतना ही हमारा यानी आम आदमी का।

आप खुद समझ जाएंगे, जनमत पर सत्यम की पोस्ट को लेकर पड़ी प्रतिक्रिया ये अंश देखिए-



...यही वह संगठन है जहां आप सत्तर-तीस के अनुपात में लड़के-लड़कियों की भागीदारी पाते हैं। लेकिन बाकी तमाम छात्र संगठनों में यह अनुपात कितना है यह पता लगाना आप जैसे लोगों के बस में नहीं है। क्योंकि तब आप क्या तर्क देंगे अपनी इस बेतुके कथन के समर्थन में आप को भी पता नहीं शायद।...
...आप के संपर्क के युवा साथी निसंदेह ऐसे ही होगें क्योंकि व्यक्ति अपने तरह के सोच वाले लोगों से ही संबध बना पाता है। ...
...अक्सर इस तरह के लेखक गैर-राजनितिक प्रवृत्ति का समर्थन करते हैं, और दावा करते हैं कि वे किसी भी राजनैतिक संगठन से नहीं जुड़े हैं। यह समझ ही एक खास तरह की राजनीति की तरफ इशारा करती है। इस समझ के लोग कोई भी राजनैतिक संगठन में लड़कियों से इन्टरैक्शन या इसी तरह के किसी बहुत ही उथळे कारण से शामिल होते हैं और किसी तरह की खुराक की खोज में रहते हैं क्योंकि बुद्धि और समझ से उनका कोई वास्ता नहीं होता।
...जिनके लिए लेफ्ट केवल दिमागी खुराक का साधन है उनके दिमाग इस खुराक का उनकी राजनैतिक समझ में प्रयोग न होने के कारण मोटे हो जाते हैं और फिर उन्हे लेफ्ट के नाम पर केवल सीपीआई और सीपीएम ही दिखने लगते है। उनका यही मोटा दीमाग लेफ्ट के तमाम धाराओं और रणनीति के बीच अन्तर करने से सचेत रुप से इन्कार कर देता।...

तुम चलोगे तो ये सब खुश हो जाएंगे (जोड़ के साथ)

आओ तुम्हे अपने गांव ले चलूं
वह गांव जो मेरे अंदर धड़कता रहता है
वह गांव जो हर जगह मेरे साथ रहता है

गांव के पश्चिम परभू वाला खेत
गांव के दक्षिण हमारा बड़हर वाला खेत
गांव के पूरब बरमबाबा
गांव के उत्तर हमारा गांवतरे वाला खेत
आओ तुम्हे अपने गांव ले चलूं

देशराज जिसके साथ मैं बारह से सोलह साल का हुआ
रेखिया जो हमारे घर के सामने रहती थी
पुष्पा ब्याह कर कहीं और चली गई
रम्मी मियां, जीवनलाल, मिसरा
आओ तुम्हे अपने गांव ले चलूं

सुकई धोबी की दुलहिन और बहुतों की भौजाई
घसीटे उपपरधान और कढ़िले
सुंदर आरट बनाने वाले रोशन दादा
और बालकराम
आओ तुम्हे अपने गांव ले चलूं

जंगल के किनारे बहती सुहेली
सैकड़ों साल पुराना किला
और किले पर होली के बाद लगने वाला मेला
कालीदेवी और वहां भौंरिया लगाना
आओ तुम्हे अपने गांव ले चलूं

मीठी जमुनी का बिरवा
हमारे घर में लगे शहतूत
नीम के नीचे की मठिया
और मठिया के लिए लड़ने वाली मझिलो दाई
आओ तुम्हे अपने गांव ले चलूं

तुम चलोगे तो ये सब खुश हो जाएंगे
आओ तुम्हे अपने गांव ले चलूं
चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ीPromote Your Blog
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