इंटरनेशनल रिप्बलिकन इंस्टीट्यूट का क्यूबा में गुप्त सर्वें-
79 फीसदी लोग मानते हैं कि देश की मौजूदा समस्याएं मौजूदा सरकार हल नहीं कर सकती।
74 फीसदी लोग मानते हैं कि फिदेल कास्त्रो का उत्तराधिकारी वोट से चुना जाना चाहिए।
77 फीसदी क्यूबन अपने यहां की चुनाव प्रणाली बदले जाने की वकालत करते हैं।
गुरुवार, 22 नवंबर 2007
तीन चौथाई अमेरिकी मानते हैं, उनका देश रसातल की तरफ
गैलप पोल का ताजा सर्वे
तीन चौथाई अमेरिकी मानते हैं, अमेरिका की आर्थिक स्थिति खराब होती जा रही है।
31 फीसदी अमेरिकियों की सबसे बड़ी चिंता उनके देश की खराब होती माली हालत है।
अमेरिकी अर्थशास्त्रियों की भी राय है कि आने वाले दिनों में अमेरिकी विकास दर और धीमी होगी। इस साल के अंत में इसके 1.5 फीसदी रहने के आसार हैं।
तीन चौथाई अमेरिकी मानते हैं, अमेरिका की आर्थिक स्थिति खराब होती जा रही है।
31 फीसदी अमेरिकियों की सबसे बड़ी चिंता उनके देश की खराब होती माली हालत है।
अमेरिकी अर्थशास्त्रियों की भी राय है कि आने वाले दिनों में अमेरिकी विकास दर और धीमी होगी। इस साल के अंत में इसके 1.5 फीसदी रहने के आसार हैं।
बुधवार, 21 नवंबर 2007
त्रिलोचन की कविता : अपना गला फंसाकर मैं भर पाया
संशय कर। संशय कर। संशय कर। संशय से
तू जीवन का प्रखर सत्य पाएगा। पट्टी
आंखो पर विश्वास की न ले। जग में टट्टी
ओट शिकार खेलने वाले मत्त विजय से
बिचर रहे हैं, मृग अर्धावलीढ कुश भय से
गिरा गिरा कर भाग रहे हैं। तबियत खट्टी
आज अहिंसा की है और शांति की सट्टी
मंद पड़ रही है लक्ष्य वेध कर, भढ़ चल नय से।
कल जो कहता था ईमान नहीं बेचूंगा,
वह चुपके ईमान बेचकर घर आया है,
क्या करता; परिजन हैं, संतति है, जाया है!
मन को समझा दिया, और कब तक खेंचूंगा
इनको अपने पीछे, अधिक नहीं मैं दूंगा।
अपना गला फंसा कर मैने भर पाया है।
-त्रिलोचन
तू जीवन का प्रखर सत्य पाएगा। पट्टी
आंखो पर विश्वास की न ले। जग में टट्टी
ओट शिकार खेलने वाले मत्त विजय से
बिचर रहे हैं, मृग अर्धावलीढ कुश भय से
गिरा गिरा कर भाग रहे हैं। तबियत खट्टी
आज अहिंसा की है और शांति की सट्टी
मंद पड़ रही है लक्ष्य वेध कर, भढ़ चल नय से।
कल जो कहता था ईमान नहीं बेचूंगा,
वह चुपके ईमान बेचकर घर आया है,
क्या करता; परिजन हैं, संतति है, जाया है!
मन को समझा दिया, और कब तक खेंचूंगा
इनको अपने पीछे, अधिक नहीं मैं दूंगा।
अपना गला फंसा कर मैने भर पाया है।
-त्रिलोचन
रविवार, 18 नवंबर 2007
आम आदमी को गरिया कर आएगा इनका समाजवाद-जनवाद-2
लगता है कि लिबरेशन के जो लोग जनमत ब्लाग पर लिख रहे हैं, उनका पक्का विश्वास है कि आम आदमी को गरिया कर ही समाजवाद-जनवाद लाया जा सकेगा। विनोद मिश्रा की लीगैसी वाले ये लोग इतना डरे हुए क्यों हैं? नंदीग्राम को लेकर किन्ही सत्यम ने एक पोस्ट लिखी और लिबरेशन के लोग दाना-पानी लेकर उसके पीछे भी पड़ गए। ऐसी बात कर रहे हैं ये लोग जैसे कोई भी ब्लाग लिखे तो कीबोर्ड इन्हीं से मांगे, नहीं उसे कुंठित करार दे दिया जाएगा।
मेरी जो मोटी समझ है, उसके मुताबिक यदि आप सामाजिक क्रांति और एक नए समाज के निर्माण के लिए काम कर रहे हैं तो आपको आम आदमी की चिंताओं, भ्रांतियों को सहिष्णुता से साफ करना चाहिए और उसकी सोच, सपनों व आकांक्षाओं को भी समझना चाहिए। हो उल्टा रहा है। कोई यदि अपनी बात रख दे, तो ये उसे भ्रष्ट, कुंठित और न जाने क्या क्या करार दे देते हैं जिससे के वह इनसे डरे और न अपनी बात रखे और न ही इनके यहां की गड़बड़ियों पर उंगली उठाने की हिम्मत करे।
ये लोग मार्क्स से ही कुछ सीखें कि उनने उस समय के समाज को समझा, उनकी दिक्कतें समझीं, उनकी आकांक्षाएं समझीं और फिर उनके हिसाब से नए समाज का खाका दिया। साथ में मजबूत दार्शनिक व आर्थिक आधार। लेकिन ये लोग ऐसा कुछ करने की जहमत नहीं उठाना चाहते। मार्क्स की आइडियोलाजी लेकर चलना कतई गलत नहीं है लेकिन लकीर के फकीर बनकर दुर्भाग्यपूर्ण है। उनका चश्मा आज नहीं चल सकता। अब नंबर बदल गया है। दूसरा चश्मा बनाना ही पड़ेगा। ये लोग चश्मा बदलना नहीं चाहते और ऊपर से गाली-गलौज कर सबको धमकाने पर आमादा नजर आते हैं जनवादी शब्दभंडार से। मोहल्ला पर सत्यम के पोस्ट पर इन्होंने यही करने की कोशिश की है।
लेकिन हम हिंदुस्तान में रहते हैं, पाकिस्तान या चीन में नहीं जहां कुत्तों को भी भौकने के लिए जनरल या सेक्रेटरी जनरल से परमीशन लेनी पड़ती है (हमें कम से कम ये जनवादी आदमी तो मानते ही होंगे, ऐसा मैं सोचता हूं लेकिन हो सकता है कि ये हमें आदमी से कमतर और अपने को आदमी से भी बेहतर मानते हों)। और ब्लाग जितना इनका है उतना ही हमारा यानी आम आदमी का।
आप खुद समझ जाएंगे, जनमत पर सत्यम की पोस्ट को लेकर पड़ी प्रतिक्रिया ये अंश देखिए-
...यही वह संगठन है जहां आप सत्तर-तीस के अनुपात में लड़के-लड़कियों की भागीदारी पाते हैं। लेकिन बाकी तमाम छात्र संगठनों में यह अनुपात कितना है यह पता लगाना आप जैसे लोगों के बस में नहीं है। क्योंकि तब आप क्या तर्क देंगे अपनी इस बेतुके कथन के समर्थन में आप को भी पता नहीं शायद।...
...आप के संपर्क के युवा साथी निसंदेह ऐसे ही होगें क्योंकि व्यक्ति अपने तरह के सोच वाले लोगों से ही संबध बना पाता है। ...
...अक्सर इस तरह के लेखक गैर-राजनितिक प्रवृत्ति का समर्थन करते हैं, और दावा करते हैं कि वे किसी भी राजनैतिक संगठन से नहीं जुड़े हैं। यह समझ ही एक खास तरह की राजनीति की तरफ इशारा करती है। इस समझ के लोग कोई भी राजनैतिक संगठन में लड़कियों से इन्टरैक्शन या इसी तरह के किसी बहुत ही उथळे कारण से शामिल होते हैं और किसी तरह की खुराक की खोज में रहते हैं क्योंकि बुद्धि और समझ से उनका कोई वास्ता नहीं होता।
...जिनके लिए लेफ्ट केवल दिमागी खुराक का साधन है उनके दिमाग इस खुराक का उनकी राजनैतिक समझ में प्रयोग न होने के कारण मोटे हो जाते हैं और फिर उन्हे लेफ्ट के नाम पर केवल सीपीआई और सीपीएम ही दिखने लगते है। उनका यही मोटा दीमाग लेफ्ट के तमाम धाराओं और रणनीति के बीच अन्तर करने से सचेत रुप से इन्कार कर देता।...
मेरी जो मोटी समझ है, उसके मुताबिक यदि आप सामाजिक क्रांति और एक नए समाज के निर्माण के लिए काम कर रहे हैं तो आपको आम आदमी की चिंताओं, भ्रांतियों को सहिष्णुता से साफ करना चाहिए और उसकी सोच, सपनों व आकांक्षाओं को भी समझना चाहिए। हो उल्टा रहा है। कोई यदि अपनी बात रख दे, तो ये उसे भ्रष्ट, कुंठित और न जाने क्या क्या करार दे देते हैं जिससे के वह इनसे डरे और न अपनी बात रखे और न ही इनके यहां की गड़बड़ियों पर उंगली उठाने की हिम्मत करे।
ये लोग मार्क्स से ही कुछ सीखें कि उनने उस समय के समाज को समझा, उनकी दिक्कतें समझीं, उनकी आकांक्षाएं समझीं और फिर उनके हिसाब से नए समाज का खाका दिया। साथ में मजबूत दार्शनिक व आर्थिक आधार। लेकिन ये लोग ऐसा कुछ करने की जहमत नहीं उठाना चाहते। मार्क्स की आइडियोलाजी लेकर चलना कतई गलत नहीं है लेकिन लकीर के फकीर बनकर दुर्भाग्यपूर्ण है। उनका चश्मा आज नहीं चल सकता। अब नंबर बदल गया है। दूसरा चश्मा बनाना ही पड़ेगा। ये लोग चश्मा बदलना नहीं चाहते और ऊपर से गाली-गलौज कर सबको धमकाने पर आमादा नजर आते हैं जनवादी शब्दभंडार से। मोहल्ला पर सत्यम के पोस्ट पर इन्होंने यही करने की कोशिश की है।
लेकिन हम हिंदुस्तान में रहते हैं, पाकिस्तान या चीन में नहीं जहां कुत्तों को भी भौकने के लिए जनरल या सेक्रेटरी जनरल से परमीशन लेनी पड़ती है (हमें कम से कम ये जनवादी आदमी तो मानते ही होंगे, ऐसा मैं सोचता हूं लेकिन हो सकता है कि ये हमें आदमी से कमतर और अपने को आदमी से भी बेहतर मानते हों)। और ब्लाग जितना इनका है उतना ही हमारा यानी आम आदमी का।
आप खुद समझ जाएंगे, जनमत पर सत्यम की पोस्ट को लेकर पड़ी प्रतिक्रिया ये अंश देखिए-
...यही वह संगठन है जहां आप सत्तर-तीस के अनुपात में लड़के-लड़कियों की भागीदारी पाते हैं। लेकिन बाकी तमाम छात्र संगठनों में यह अनुपात कितना है यह पता लगाना आप जैसे लोगों के बस में नहीं है। क्योंकि तब आप क्या तर्क देंगे अपनी इस बेतुके कथन के समर्थन में आप को भी पता नहीं शायद।...
...आप के संपर्क के युवा साथी निसंदेह ऐसे ही होगें क्योंकि व्यक्ति अपने तरह के सोच वाले लोगों से ही संबध बना पाता है। ...
...अक्सर इस तरह के लेखक गैर-राजनितिक प्रवृत्ति का समर्थन करते हैं, और दावा करते हैं कि वे किसी भी राजनैतिक संगठन से नहीं जुड़े हैं। यह समझ ही एक खास तरह की राजनीति की तरफ इशारा करती है। इस समझ के लोग कोई भी राजनैतिक संगठन में लड़कियों से इन्टरैक्शन या इसी तरह के किसी बहुत ही उथळे कारण से शामिल होते हैं और किसी तरह की खुराक की खोज में रहते हैं क्योंकि बुद्धि और समझ से उनका कोई वास्ता नहीं होता।
...जिनके लिए लेफ्ट केवल दिमागी खुराक का साधन है उनके दिमाग इस खुराक का उनकी राजनैतिक समझ में प्रयोग न होने के कारण मोटे हो जाते हैं और फिर उन्हे लेफ्ट के नाम पर केवल सीपीआई और सीपीएम ही दिखने लगते है। उनका यही मोटा दीमाग लेफ्ट के तमाम धाराओं और रणनीति के बीच अन्तर करने से सचेत रुप से इन्कार कर देता।...
तुम चलोगे तो ये सब खुश हो जाएंगे (जोड़ के साथ)
आओ तुम्हे अपने गांव ले चलूं
वह गांव जो मेरे अंदर धड़कता रहता है
वह गांव जो हर जगह मेरे साथ रहता है
गांव के पश्चिम परभू वाला खेत
गांव के दक्षिण हमारा बड़हर वाला खेत
गांव के पूरब बरमबाबा
गांव के उत्तर हमारा गांवतरे वाला खेत
आओ तुम्हे अपने गांव ले चलूं
देशराज जिसके साथ मैं बारह से सोलह साल का हुआ
रेखिया जो हमारे घर के सामने रहती थी
पुष्पा ब्याह कर कहीं और चली गई
रम्मी मियां, जीवनलाल, मिसरा
आओ तुम्हे अपने गांव ले चलूं
सुकई धोबी की दुलहिन और बहुतों की भौजाई
घसीटे उपपरधान और कढ़िले
सुंदर आरट बनाने वाले रोशन दादा
और बालकराम
आओ तुम्हे अपने गांव ले चलूं
जंगल के किनारे बहती सुहेली
सैकड़ों साल पुराना किला
और किले पर होली के बाद लगने वाला मेला
कालीदेवी और वहां भौंरिया लगाना
आओ तुम्हे अपने गांव ले चलूं
मीठी जमुनी का बिरवा
हमारे घर में लगे शहतूत
नीम के नीचे की मठिया
और मठिया के लिए लड़ने वाली मझिलो दाई
आओ तुम्हे अपने गांव ले चलूं
तुम चलोगे तो ये सब खुश हो जाएंगे
आओ तुम्हे अपने गांव ले चलूं
वह गांव जो मेरे अंदर धड़कता रहता है
वह गांव जो हर जगह मेरे साथ रहता है
गांव के पश्चिम परभू वाला खेत
गांव के दक्षिण हमारा बड़हर वाला खेत
गांव के पूरब बरमबाबा
गांव के उत्तर हमारा गांवतरे वाला खेत
आओ तुम्हे अपने गांव ले चलूं
देशराज जिसके साथ मैं बारह से सोलह साल का हुआ
रेखिया जो हमारे घर के सामने रहती थी
पुष्पा ब्याह कर कहीं और चली गई
रम्मी मियां, जीवनलाल, मिसरा
आओ तुम्हे अपने गांव ले चलूं
सुकई धोबी की दुलहिन और बहुतों की भौजाई
घसीटे उपपरधान और कढ़िले
सुंदर आरट बनाने वाले रोशन दादा
और बालकराम
आओ तुम्हे अपने गांव ले चलूं
जंगल के किनारे बहती सुहेली
सैकड़ों साल पुराना किला
और किले पर होली के बाद लगने वाला मेला
कालीदेवी और वहां भौंरिया लगाना
आओ तुम्हे अपने गांव ले चलूं
मीठी जमुनी का बिरवा
हमारे घर में लगे शहतूत
नीम के नीचे की मठिया
और मठिया के लिए लड़ने वाली मझिलो दाई
आओ तुम्हे अपने गांव ले चलूं
तुम चलोगे तो ये सब खुश हो जाएंगे
आओ तुम्हे अपने गांव ले चलूं
शनिवार, 17 नवंबर 2007
आम आदमी को गरिया कर आएगा इनका समाजवाद-जनवाद
सूडो सेकुलर के बाद अब दुमछल्ला वामपंथ शीर्षक वाली मेरी पोस्ट पर झल्ला कर जनमत ब्लाग पर गालियों की बौछार ही कर दी गई। बहुत सारे सवाल दाग दिए और मुझ पर आरोपों की ऐसी बौछार कर दी गई जैसे मेरी इस पोस्ट से इनका जनवाद गायब हो जाएगा।
नहीं भाईसाहब, आप ही तय करेंगे दुमछल्ला कौन है और छल्ला कौन है? मैं न तो किसी राजनीतिक पार्टी का मेंबर हूं न कोई एक्टिविस्ट।न मैं आप लोगों जैसा छल्ला वामपंथी हूं और न सीपीआई-सीपीएम जैसा दुमछल्ला। (आप लोग एसएफआई को अपना दुश्मन ही मानते हो)। मैं तो आम आदमी हूं जिसके लिए आप लोग समाजवाद लाने का बीड़ा उठाए हुए हैं। आम आदमी को गाली देकर समाजवाद कैसे आएगा। क्या उस समाजवाद में मेरे जैसे आम आदमी की कोई जगह होगी, जो शेयर बाजार में कुछ पैसा लगातानहीं है लेकिन सोचता जरूर है कि एक दिन इतना पैसा हो जाए कि शेयर बाजार में लगा सके। माता-पिता, बेटा-बेटी और अपने बुढ़ापे की जरूरतें पूरी करने के लिए कुछ बचत कर लेता है और पीपीएफ आदि में जमा करता है। क्या यह सब करना आपके सपनों के समाज में गुनाह होगा और जो यह करेगा,क्या उसको देश बदर कर देंगे।
आपने जो जवाब दिया है, उससे तो यही लगता है कि आप आम आदमी को ढोर-डंगर ही समझते हैं।
आपने लिखा कि मैं भ्रष्ट जनवाद का नुमाइंदा हूं, ठीक कहा आपने आम आदमी को सभी राजनीतिक दल ऐसे ही देखते हैं भले ही फिर वो लिबरेशन के टैग वाले क्यों न हों।आपने मुझे अवसरवादी बाजार प्रेमी दुमछल्ला करार दे दिया। अवसर का फायदा उठाने में क्या गड़बड़ है। आपके लोग अवसरों का फायदा नहीं उठाते क्या, आपके लोग शेयर बाजार में पैसा नहीं लगाते क्या, आपके लोग दलालस्ट्रीट का बखान करने की नौकरी नहीं करते क्या। जां तक मैंने पता लगाया है कि जेएनयू के चुनाव विश्लेषण करने वाले सज्जन दलाल स्ट्रीट की आवाज बने हुए हैं। अब आप यह तो बताइए कि जनवादी दलाल स्ट्रीट किस पाले में है।
खैर जो भी हो, आप लोग सियासी लोग हैं, हमें जो चाहिए वह कहिए। हम तो मूली-घास हैं, कुछ सवाल उठा दें तो गालियों से नवाज दीजिए। लेकिन आपके लोग कुछ करते रहें पवित्र जनवाद के नाम पर, सब जायज है।
जनमत पर यह लिखा गया है-
जनवाद का 'दलाल स्ट्रीट'
जनमत पर जेएनयू के चुनावों का दिलीप मंडल ने एक विश्लेषण रखा। जिस पर जाहिर है कई प्रतिक्रियाएं होनी थी। लेकिन पहली प्रतिक्रिया आई किसी ‘खुश’का। एसएफआई की हार से तिलमिलाए ये सज्जन जा पहुंचे त्रिलोचन शास्त्री के लिए जारी जनमत की अपील तक। फिर उन्हे याद आया कि किन्ही अनिल रघुराज( ये किन्ही अनिल रघुराज उनके ब्लॉग के 'दोस्त लोग'में हैं..फिर ये किन्ही कैसे हुए!!?) ने भी लिबरेशन और कम्यूनिज्म के विरोध में कुछ लिखा है और उसके बाद ये अपनी समझ से इस राजनीति पर कई वार करते गए। उन्हे सबसे ज्यादा आपत्ति थी दुमछल्ले वामपंथ पर। चंद्रशेखर की मां को लेकर लिखे गए टिप्पणी से उलझते हुए वे सिर टकराने लगे। लेकिन जब इनके लेखन या ब्लॉग लीला का दौरा हुआ तो सामने आया कि ऐसे भ्रष्ट जनवाद के नुमाइंदे बाजार की समझ से त्रिलोचन और सही वामपंथ को तौलते हैं। टुकडे –टुकड़े में जन आंदोलनों की कमजोरियों और सचेत ढंग से प्रचारित अफवाहों के ये सौदागर मौका तलाशते हैं कि कैसे आम लोगों को सही मुद्दों और बातचीत से भटकाया जाय.. देखिए इस दुमछल्ले वामपंथी का लेखन...जैसा कि ये खुद दावा करते हैं ये कहीं नौकरी नहीं करते लिहाजा बाजार इनकी मजबूरी नहीं बल्कि पसंद है। ये पूरी तरह बाजार की बीमारी जानते हैं लेकिन त्रिलोचन की बीमारी जानने का इन्हे कोई रास्ता नजर नहीं आता। इस बाजार प्रेमी दुमछल्ला वाम की यही कहानी है यह अवसरवाद का सबसे घृणित प्रतिनिधि है। जब यह बाजार की बात कह रहा है तो नहीं लगता कि साथ में दुमछल्ले वाम का घोषणा पत्र लिख रहा है..
ये लिखते हैं...
"शेयर बाजार में करेक्शन का दौर है, बहाना चाहे जो हो। यह करेक्शन लंबे समय से अपेक्षित था। अलबत्ता, दिवाली पर पीटने के लिए लिवाली का अच्छा मौका बन रहा है। लेकिन बाजार में लघुअवधि में फायदा वही उठा पाते हैं जो हवा का रुख भांपने में सक्षम होते हैं। पूरा खेल यह है कि क्या आप इस बात का सटीक अनुमान लगा पाते हैं कि बाजार में बहुमत की धारणा क्या है। अगर हां, तो आप राजा हैं। दूसरा फैक्टर है डर और लालच। बाजार से फायदा उठाना है तो इऩ पर विजय पानी होगी।खैर, शेयर बाजार में इस समय आशंकाओं का राज है। यह कितना गहरा है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाइए कि रिलायंस इंडस्ट्रीज व विप्रो के नतीजे भी इऩ पर काबू न कर सके।
नोट- निवेश करने से पहले खुद पोढ़े हो लें। अपन की जिम्मेदारी नहीं है।"
मेरी बाई लिस्ट
1यूको बैंक (39 से नीचे खरीदें)
2 एचएफसीएल (22-23 पर लें)
3 टेलीडाटा (55 से नीचे)
4 कोठारी शुगर (12 पर लें)
5 बलरामपुर चीनी (50 पर आने का इंतजार कर लें)
6. केसीपी शुगर (18 के नीचे खरीदें)
अब आप ही तय करिए कि क्या ऐसे लालची व्यक्तित्व वाले ही तय करेंगे कि सही जनवाद और उसकी राजनीति क्या है और त्रिलोचन का कद कितना है...मतलब यह हुआ कि शेयर बाजार में यदि किसी की रुचि हो तो वह लालची है। वह अवसरवाद का घृणित प्रतिनिधि है। मेरे जैसा आम आदमी जनवाद समझ ही नहीं सकता और न त्रिलोचन को समझ सकता है और न उनका कद सोच सकता है। उसको चंपा काले अच्छर नहीं चीन्हती कविता समझ में ही नहीं आ सकती। और न वह त्रिलोचन के अपमान को समझ सकता है। हम आप लोगों के लिए झुनझुने हैं। बजेगा तो काम का नहीं तो भाड़ में जाए और बोनस में दो-चार लात-घूंसे (गालियां) और। हां हम कैसे समझ सकते हैं, हम त्रिलोचन को शर्तों के साथ नहीं मानते हैं। हम उनको अछूत नहीं घोषित करते हैं।
रही बात त्रिलोचन की हारी-बीमारी जानने की तो त्रिलोचन तो जनता के कवि हैं लिबरेशन के नहीं और हम जैसी जनता उनका हालचाल जान ही लेगी, जनवादी लोगों को चिंता करने की जरूरत नहीं है। यदि हमारे जैसा आम आदमी बाबा के लिए कुछ करना चाह रहा होगा तो उसका ढिंढोरा नहीं पीटेगा। आपसे पूछने की भी जरूरत नहीं है।
लेकिन मुझे दुख इस बात का है कि मैने त्रिलोचन के लिए जनमत की दया की अपील और जेएनयू चुनाव पर विश्लेषण को लेकर जो सवाल उठाए और जिनसे ये लोग तिलमिलाए, उनका तो मुझे इनकी पोस्ट में जवाब ही नहीं मिला। मिलता भी क्यों जनवादी लोगों को शायद जनता के सवालों का जवाब देने की जरूरत ही नहीं। देश की राजनीति की यही विडंबना है, चाहें कांग्रेस हो या भाजपा, माकपा-भाकपा हो या लिबरेशन, जनता के प्रति जवाबदेही गायब है। इनके अपने चश्मे जिनसे ये दुनिया देखते हैं और
अपनी प्रजा यानी आम जनता
के मुद्दे हल करते हैं।
अंत में 3 सवाल और
1.मैं ब्लाग लिखूं तो ये लिबरेशन के जनवादी इसे लीला कहते हैं लेकिन इनका ब्लाग लिखना लीला नहीं है पवित्र जनवाद है?
2.ये लोग इतना क्यों डर गए कि मेरे ब्लाग के सारे लिंक भी तुरंत खंगाल डाले?
3.इन्होंने कहा कि मैंने अपनी समझ का इस्तेमाल टिप्पणी लिखने में किया है। भाई मैं तो अपनी समझ से काम लेता हूं, हो सकता है लोग उधार की समझ से काम चलाते हों (अब इसे उधार की कहें या लकीर की फकीरी कहें, लेकिन इनकी समझ है कहीं और से ही संचालित)? अपनी समझ का इस्तेमाल करना क्या भ्रष्ट और घृणित होने की निशानी है?
नहीं भाईसाहब, आप ही तय करेंगे दुमछल्ला कौन है और छल्ला कौन है? मैं न तो किसी राजनीतिक पार्टी का मेंबर हूं न कोई एक्टिविस्ट।न मैं आप लोगों जैसा छल्ला वामपंथी हूं और न सीपीआई-सीपीएम जैसा दुमछल्ला। (आप लोग एसएफआई को अपना दुश्मन ही मानते हो)। मैं तो आम आदमी हूं जिसके लिए आप लोग समाजवाद लाने का बीड़ा उठाए हुए हैं। आम आदमी को गाली देकर समाजवाद कैसे आएगा। क्या उस समाजवाद में मेरे जैसे आम आदमी की कोई जगह होगी, जो शेयर बाजार में कुछ पैसा लगातानहीं है लेकिन सोचता जरूर है कि एक दिन इतना पैसा हो जाए कि शेयर बाजार में लगा सके। माता-पिता, बेटा-बेटी और अपने बुढ़ापे की जरूरतें पूरी करने के लिए कुछ बचत कर लेता है और पीपीएफ आदि में जमा करता है। क्या यह सब करना आपके सपनों के समाज में गुनाह होगा और जो यह करेगा,क्या उसको देश बदर कर देंगे।
आपने जो जवाब दिया है, उससे तो यही लगता है कि आप आम आदमी को ढोर-डंगर ही समझते हैं।
आपने लिखा कि मैं भ्रष्ट जनवाद का नुमाइंदा हूं, ठीक कहा आपने आम आदमी को सभी राजनीतिक दल ऐसे ही देखते हैं भले ही फिर वो लिबरेशन के टैग वाले क्यों न हों।आपने मुझे अवसरवादी बाजार प्रेमी दुमछल्ला करार दे दिया। अवसर का फायदा उठाने में क्या गड़बड़ है। आपके लोग अवसरों का फायदा नहीं उठाते क्या, आपके लोग शेयर बाजार में पैसा नहीं लगाते क्या, आपके लोग दलालस्ट्रीट का बखान करने की नौकरी नहीं करते क्या। जां तक मैंने पता लगाया है कि जेएनयू के चुनाव विश्लेषण करने वाले सज्जन दलाल स्ट्रीट की आवाज बने हुए हैं। अब आप यह तो बताइए कि जनवादी दलाल स्ट्रीट किस पाले में है।
खैर जो भी हो, आप लोग सियासी लोग हैं, हमें जो चाहिए वह कहिए। हम तो मूली-घास हैं, कुछ सवाल उठा दें तो गालियों से नवाज दीजिए। लेकिन आपके लोग कुछ करते रहें पवित्र जनवाद के नाम पर, सब जायज है।
जनमत पर यह लिखा गया है-
जनवाद का 'दलाल स्ट्रीट'
जनमत पर जेएनयू के चुनावों का दिलीप मंडल ने एक विश्लेषण रखा। जिस पर जाहिर है कई प्रतिक्रियाएं होनी थी। लेकिन पहली प्रतिक्रिया आई किसी ‘खुश’का। एसएफआई की हार से तिलमिलाए ये सज्जन जा पहुंचे त्रिलोचन शास्त्री के लिए जारी जनमत की अपील तक। फिर उन्हे याद आया कि किन्ही अनिल रघुराज( ये किन्ही अनिल रघुराज उनके ब्लॉग के 'दोस्त लोग'में हैं..फिर ये किन्ही कैसे हुए!!?) ने भी लिबरेशन और कम्यूनिज्म के विरोध में कुछ लिखा है और उसके बाद ये अपनी समझ से इस राजनीति पर कई वार करते गए। उन्हे सबसे ज्यादा आपत्ति थी दुमछल्ले वामपंथ पर। चंद्रशेखर की मां को लेकर लिखे गए टिप्पणी से उलझते हुए वे सिर टकराने लगे। लेकिन जब इनके लेखन या ब्लॉग लीला का दौरा हुआ तो सामने आया कि ऐसे भ्रष्ट जनवाद के नुमाइंदे बाजार की समझ से त्रिलोचन और सही वामपंथ को तौलते हैं। टुकडे –टुकड़े में जन आंदोलनों की कमजोरियों और सचेत ढंग से प्रचारित अफवाहों के ये सौदागर मौका तलाशते हैं कि कैसे आम लोगों को सही मुद्दों और बातचीत से भटकाया जाय.. देखिए इस दुमछल्ले वामपंथी का लेखन...जैसा कि ये खुद दावा करते हैं ये कहीं नौकरी नहीं करते लिहाजा बाजार इनकी मजबूरी नहीं बल्कि पसंद है। ये पूरी तरह बाजार की बीमारी जानते हैं लेकिन त्रिलोचन की बीमारी जानने का इन्हे कोई रास्ता नजर नहीं आता। इस बाजार प्रेमी दुमछल्ला वाम की यही कहानी है यह अवसरवाद का सबसे घृणित प्रतिनिधि है। जब यह बाजार की बात कह रहा है तो नहीं लगता कि साथ में दुमछल्ले वाम का घोषणा पत्र लिख रहा है..
ये लिखते हैं...
"शेयर बाजार में करेक्शन का दौर है, बहाना चाहे जो हो। यह करेक्शन लंबे समय से अपेक्षित था। अलबत्ता, दिवाली पर पीटने के लिए लिवाली का अच्छा मौका बन रहा है। लेकिन बाजार में लघुअवधि में फायदा वही उठा पाते हैं जो हवा का रुख भांपने में सक्षम होते हैं। पूरा खेल यह है कि क्या आप इस बात का सटीक अनुमान लगा पाते हैं कि बाजार में बहुमत की धारणा क्या है। अगर हां, तो आप राजा हैं। दूसरा फैक्टर है डर और लालच। बाजार से फायदा उठाना है तो इऩ पर विजय पानी होगी।खैर, शेयर बाजार में इस समय आशंकाओं का राज है। यह कितना गहरा है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाइए कि रिलायंस इंडस्ट्रीज व विप्रो के नतीजे भी इऩ पर काबू न कर सके।
नोट- निवेश करने से पहले खुद पोढ़े हो लें। अपन की जिम्मेदारी नहीं है।"
मेरी बाई लिस्ट
1यूको बैंक (39 से नीचे खरीदें)
2 एचएफसीएल (22-23 पर लें)
3 टेलीडाटा (55 से नीचे)
4 कोठारी शुगर (12 पर लें)
5 बलरामपुर चीनी (50 पर आने का इंतजार कर लें)
6. केसीपी शुगर (18 के नीचे खरीदें)
अब आप ही तय करिए कि क्या ऐसे लालची व्यक्तित्व वाले ही तय करेंगे कि सही जनवाद और उसकी राजनीति क्या है और त्रिलोचन का कद कितना है...मतलब यह हुआ कि शेयर बाजार में यदि किसी की रुचि हो तो वह लालची है। वह अवसरवाद का घृणित प्रतिनिधि है। मेरे जैसा आम आदमी जनवाद समझ ही नहीं सकता और न त्रिलोचन को समझ सकता है और न उनका कद सोच सकता है। उसको चंपा काले अच्छर नहीं चीन्हती कविता समझ में ही नहीं आ सकती। और न वह त्रिलोचन के अपमान को समझ सकता है। हम आप लोगों के लिए झुनझुने हैं। बजेगा तो काम का नहीं तो भाड़ में जाए और बोनस में दो-चार लात-घूंसे (गालियां) और। हां हम कैसे समझ सकते हैं, हम त्रिलोचन को शर्तों के साथ नहीं मानते हैं। हम उनको अछूत नहीं घोषित करते हैं।
रही बात त्रिलोचन की हारी-बीमारी जानने की तो त्रिलोचन तो जनता के कवि हैं लिबरेशन के नहीं और हम जैसी जनता उनका हालचाल जान ही लेगी, जनवादी लोगों को चिंता करने की जरूरत नहीं है। यदि हमारे जैसा आम आदमी बाबा के लिए कुछ करना चाह रहा होगा तो उसका ढिंढोरा नहीं पीटेगा। आपसे पूछने की भी जरूरत नहीं है।
लेकिन मुझे दुख इस बात का है कि मैने त्रिलोचन के लिए जनमत की दया की अपील और जेएनयू चुनाव पर विश्लेषण को लेकर जो सवाल उठाए और जिनसे ये लोग तिलमिलाए, उनका तो मुझे इनकी पोस्ट में जवाब ही नहीं मिला। मिलता भी क्यों जनवादी लोगों को शायद जनता के सवालों का जवाब देने की जरूरत ही नहीं। देश की राजनीति की यही विडंबना है, चाहें कांग्रेस हो या भाजपा, माकपा-भाकपा हो या लिबरेशन, जनता के प्रति जवाबदेही गायब है। इनके अपने चश्मे जिनसे ये दुनिया देखते हैं और
अपनी प्रजा यानी आम जनता
के मुद्दे हल करते हैं।
अंत में 3 सवाल और
1.मैं ब्लाग लिखूं तो ये लिबरेशन के जनवादी इसे लीला कहते हैं लेकिन इनका ब्लाग लिखना लीला नहीं है पवित्र जनवाद है?
2.ये लोग इतना क्यों डर गए कि मेरे ब्लाग के सारे लिंक भी तुरंत खंगाल डाले?
3.इन्होंने कहा कि मैंने अपनी समझ का इस्तेमाल टिप्पणी लिखने में किया है। भाई मैं तो अपनी समझ से काम लेता हूं, हो सकता है लोग उधार की समझ से काम चलाते हों (अब इसे उधार की कहें या लकीर की फकीरी कहें, लेकिन इनकी समझ है कहीं और से ही संचालित)? अपनी समझ का इस्तेमाल करना क्या भ्रष्ट और घृणित होने की निशानी है?
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