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सोमवार, 12 नवंबर 2007

यूको बढ़ने लगा, एचपीसीएल भी शार्ट टर्म में भागेगा

यूको बैंक आज 49 से ऊपर पहुंचा और अब उसे रोकने वाला कोई नहीं होगा। 50 से नीचे पकड़ लीजिए, इसके बाद मौका नहीं मिलेगा।
एचपीसीएल 260 पर पकड़िये और शुक्रवार तक निकालने का मौका मिल जाएगा।

मरना हो तो अनायास

मरना हो तो अनायास, जीना हो तो बिना दीनता के
तुम कुछ कहते हो, मैं कुछ और सोचता रहता हूं। लेकिन तुम्हारी हर बात का जवाब देते हुए। तुमसे बात करते समय मेरी आंखों के सामने तिरता रहता है कि कैसे मैने तुमको अर्न किया है। लगता है कल की बात हो लेकिन 22 बरस हो गए। तुमको पहली बार बाटनी की सीढ़ियों पर देखा था। कैंपस का मेरा पहला दोस्त तुमको जानता था और वह तुमसे कोई बात कर रहा था और मैं उसके साथ था। मेरा मन हो रहा था कि मैं भी तुमसे कुछ बात करूं। हमारे-तुम्हारे बीच कुछ भी कामन नहीं था कि मैं कोई बात कर सकने की स्थित में अपने को ला पाता। तारीख मुझे अच्छे से याद नहीं। वह फरवरी का महीना था। लखनऊ में फरवरी का महीना कुछ अलग होता है। कैंपस में अकसर मैं तुमको तलाशता रहता, कभी तुम दिखतीं और अकसर नहीं। दिमाग तर्क करता कि कहां तुम और कहां वो। मेरा परिवेश और तुम्हारा परिवेश, बाहर से कहीं कोई साम्य नहीं। होली का मौसम था। तभी कैंपस में खबर फैली कि इकोनोमिक्स के डा. माथुर का आईटी पर एक्सीडेंट हो गया। मैं उनको नहीं जानता था, दोस्तों की बातों से पता चला कि वे तुम्हारे पिता हैं।

शनिवार, 10 नवंबर 2007

चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ीटेढ़े-मेढे़ रास्तों पर कभी-कभार इतनी सीधी सी पगडंडियां मिलती हैं कि लगने लगता है जैसे इनपर मुड़कर सुकून के दो पल मिल सकते हैं। हम मुड़ जाते हैं और पाते हैं सामुद्रिक विस्तार और उसके साथ जुड़ी वे तमाम बेचैनियां और हिचकोलों के बीच डगमगा रहे जहाज की डेक जैसा आधार। और फिर जब फिर से मुख्य रास्ते पर आते हैं तो समय लगता इस बात को लेकर आश्वस्त होने में कि पैरों के नीचे पानी का अथार विस्तार नहीं ठोस जमीन है।
फरवरी का महीना था सन 2007 का।

शुक्रवार, 9 नवंबर 2007

चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी
अखाड़े का उदास मुगदर पर एक पोस्ट पर प्रदर्शित टिप्पणियों के जवाब में
मिहिरभोज और अनुनाद सिंह जी,
सही और तार्किक बातों को फासिस्ट ताकतें हमेशा इमोशन से ढंकती आई हैं। सीधे-सादे लोग उन इमोशंस में बहकर इन ताकतों के पीछे खड़े हो जाते हैं, बिना यह समझे कि वे कितना बड़ा अपराध कर रहे हैं। इन सीधे-सादे लोगों की गलती नहीं होती क्योंकि वे सरल रेखा में ही चीजों को देखते हैं। और इसी ट्रिक से कभी हिटलर, कभी मुसोलनी, कभी जियाउलहक, कभी मुशरर्फ और कभी मोदी खड़े होते हैं एक बड़े स,े खोल के साथ। यह खोल फूला होता है इन्हीं सीधे-सादे लोगों के सपोर्ट की हवा से। इसमें ठोस कुछ नहीं होता और यही वजह है कि जब इस खोल की हवा निकलती है तो कुछ बचता नहीं है। आप लोग तो पढ़े-लिखे लगते हैं, इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं यानी देश के उन चुनिंदा लोगों में से हैं जिनपर देश को नए जमाने में प्रगति की राह पर ले जाने की जिम्मेदारी आयद है। लेकिन उम्मीद कम ही नजर आती है। खैर, सबको हक है अपनी-अपनी बात रखने का और अपना-अपना पाला तय करने का लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इतिहास ने भी हिटलर के समर्थकों को भी फासिस्ट ही कहा, इनमें बहुत से लोग आप जैसे भले और सीधे-सादे भी रहे होंगे।

रविवार, 4 नवंबर 2007

चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी
जंगल में गुम गए बछड़े सा वह भटक रहा है। कभी चारे की तलाश में तो कभी पानी की तलाश में और कभी सिर्फ इसलिए कि वह कहां जाए। चंचलता भी उतनी ही और आकुलता भी। कितने कूल मिले और कितने शूल, गिनती नहीं लेकिन अब तक न वह कूल मिला और न वह शूल जिसकी तलाश उसे है।

गुरुवार, 1 नवंबर 2007

36 में खरीदें यूको बैंक

न्यूयार्क में बैंकिंग शेयर गिरे हैं। आईसीआईसीआई 6 फीसदी और एचडीएफसी 4 फीसदी गिरा है। तेल की कीमतें 96 डालर तक पहुंच गई। आज भारतीय शेयर बाजार गिरने की ही आशंका है। दांव लगाइए यूको बैंक पर। 36 में मिले बटोर लीजिए। जनवरी तक 150 तक पहुंचेगा। मौका ज्यादा देर नहीं रहने वाला।

मंगलवार, 30 अक्टूबर 2007

चिदंबरम के बयान पर

देश में डालरों की वर्षा है
सेंसेक्स का तूफान है
अपनी अर्थव्यवस्था लेकिन परेशान है

(चिदंबरम के बयान पर)
चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ीPromote Your Blog
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